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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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सञ्जय़ उवाच
आश्चर्यभूतं लोकेऽस्मिन्समुद्रस्येव शोषणम् |  ६   क
निर्जय़ं तव विप्राग्र्य सात्वतेनार्जुनेन च ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति