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द्रोण पर्व
अध्याय १०५
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द्रोण उवाच
अत्र सर्वे महाराज त्यक्त्वा जीवितमात्मनः |  १९   क
सैन्धवस्य रणे रक्षां विधिवत्कर्तुमर्हथ |  १९   ख
तत्र नो ग्लहमानानां ध्रुवौ तात जय़ाजय़ौ ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति