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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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शक्र उवाच
येषां वेदा निहिता वै गुहाय़ां; मनीषिणां सत्त्ववतां महात्मनाम् |  ६०   क
तेषां त्वय़ैकेन महात्मनास्मि; वुद्धस्तस्मात्प्रीतिमांस्तेऽहमद्य ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति