शान्ति पर्व  अध्याय १०५

मुनिरु उवाच

तां वुद्धिमुपजिज्ञासुस्त्वमेवैनान्परित्यज |  ३७   क
अनर्थांश्चार्थरूपेण अर्थांश्चानर्थरूपतः ||  ३७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति