शान्ति पर्व  अध्याय १०५

मुनिरु उवाच

यथा लव्धोपपन्नार्थस्तथा कौसल्य रंस्यसे |  २९   क
कच्चिच्छुद्धस्वभावेन श्रिय़ा हीनो न शोचसि ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति