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आदि पर्व
अध्याय १०५
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वैशम्पाय़न उवाच
मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं तथा |  १७   क
गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति