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वन पर्व
अध्याय १०४
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युधिष्ठिर उवाच
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण तपोधन |  ४   क
कथ्यमानं त्वय़ा विप्र राज्ञां चरितमुत्तमम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति