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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
किरीटमाली वलवाञ्श्वेताश्वः कृष्णसारथिः |  ४१   क
मम प्रिय़श्च सततं दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति