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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
यथा प्रज्वलितं वह्निं पतङ्गः समभिद्रवन् |  २०   क
एकतो मृत्युमभ्येति तथाहं भीष्ममीय़िवान् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति