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वन पर्व
अध्याय १०३
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लोमश उवाच
एष लोकहितार्थं वै पिवामि वरुणालय़म् |  २   क
भवद्भिर्यदनुष्ठेय़ं तच्छीघ्रं संविधीय़ताम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति