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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
अगस्त्योऽपि महातेजाः कृत्वा कार्यं शतक्रतोः |  २८   क
स्वमाश्रमपदं प्राय़ात्पूज्यमानो द्विजातिभिः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति