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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
तत्रावेक्ष्य दिशः सर्वाः सव्यसाचिदिदृक्षय़ा |  ५   क
युधिष्ठिरो ददर्शाथ नैव पार्थं न माधवम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति