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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
वर्तमाने तथा रौद्रे सङ्ग्रामे लोमहर्षणे |  २   क
प्रक्षय़े जगतस्तीव्रे युगान्त इव भारत ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति