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अनुशासन पर्व
अध्याय १०२
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अगस्त्य उवाच
अमृतं चैव पानाय़ दत्तमस्मै पुरा विभो |  १९   क
महात्मने तदर्थं च नास्माभिर्विनिपात्यते ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति