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द्रोण पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽव्रवीन्महाराज द्रुपदो वुद्धिमान्नृप |  ७१   क
लुव्धोऽय़ं क्षत्रिय़ान्हन्ति व्याघ्रः क्षुद्रमृगानिव ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति