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भीष्म पर्व
अध्याय १०१
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सञ्जय़ उवाच
मद्रराजोऽपि तान्सर्वानाजघान त्रिभिस्त्रिभिः |  ३१   क
युधिष्ठिरं पुनः षष्ट्या विव्याध निशितैः शरैः |  ३१   ख
माद्रीपुत्रौ च संरव्धौ द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडय़त् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति