अनुशासन पर्व  अध्याय १०१

शुक्र उवाच

गन्धेन देवास्तुष्यन्ति दर्शनाद्यक्षराक्षसाः |  ३४   क
नागाः समुपभोगेन त्रिभिरेतैस्तु मानुषाः ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति