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आदि पर्व
अध्याय १०१
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जनमेजय़ उवाच
किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेय़िवान् |  १   क
कस्य शापाच्च व्रह्मर्षे शूद्रय़ोनावजाय़त ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति