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वन पर्व
अध्याय १००
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लोमश उवाच
एवं रात्रौ स्म कुर्वन्ति विविशुश्चार्णवं दिवा |  ५   क
भरद्वाजाश्रमे चैव निय़ता व्रह्मचारिणः |  ५   ख
वाय़्वाहाराम्वुभक्षाश्च विंशतिः संनिपातिताः ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति