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अनुशासन पर्व
अध्याय १००
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पृथिव्यु उवाच
धन्वन्तरेः प्रागुदीच्यां प्राच्यां शक्राय़ माधव |  १२   क
मनोर्वै इति च प्राहुर्वलिं द्वारे गृहस्य वै |  १२   ख
मरुद्भ्यो देवताभ्यश्च वलिमन्तर्गृहे हरेत् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति