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शल्य पर्व
अध्याय १०
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सञ्जय़ उवाच
शल्योऽपि राजन्सङ्क्रुद्धो निघ्नन्सोमकपाण्डवान् |  ४१   क
पुनरेव शितैर्वाणैर्युधिष्ठिरमपीडय़त् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति