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विराट पर्व
अध्याय १०
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अर्जुन उवाच
इदं तु रूपं मम येन किं नु त; त्प्रकीर्तय़ित्वा भृशशोकवर्धनम् |  ९   क
वृहन्नडां वै नरदेव विद्धि मां; सुतं सुतां वा पितृमातृवर्जिताम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति