सभा पर्व  अध्याय १०

नारद उवाच

मांसमेदोवसाहारैरुग्रश्रवणदर्शनैः |  २२   क
नानाप्रहरणैर्घोरैर्वातैरिव महाजवैः |  २२   ख
वृतः सखाय़मन्वास्ते सदैव धनदं नृप ||  २२   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति