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अनुशासन पर्व
अध्याय १०
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राजो उवाच
एवं तवोग्रं हि तप उपदेशेन नाशितम् |  ५४   क
पुरोहितत्वमुत्सृज्य यतस्व त्वं पुनर्भवे ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति