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अनुशासन पर्व
अध्याय १०
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राजो उवाच
एतेन कर्मदोषेण पुरोधास्त्वमजाय़थाः |  ५१   क
अहं राजा च विप्रेन्द्र पश्य कालस्य पर्ययम् |  ५१   ख
मत्कृते ह्युपदेशेन त्वय़ा प्राप्तमिदं फलम् ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति