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शल्य पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
विद्वन्क्षत्तर्महाप्राज्ञ त्वं गतिर्भरतर्षभ |  ४३   क
ममानाथस्य सुभृशं पुत्रैर्हीनस्य सर्वशः |  ४३   ख
एवमुक्त्वा ततो भूय़ो विसञ्ज्ञो निपपात ह ||  ४३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति