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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
वृकोदरेण क्षुद्रेण सुनृशंसमिदं कृतम् |  ५८   क
मूर्धाभिषिक्तस्य शिरः पादेन परिमृद्नता ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति