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सौप्तिक पर्व
अध्याय १
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सञ्जय़ उवाच
यच्चाप्यत्र भवेद्वाच्यं गर्हितं लोकनिन्दितम् |  ४८   क
कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति