chevron_left  हाहाकारस्ततोarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १९३
भीष्म उवाच
हाहाकारस्ततो दिक्षु सर्वासु सुमहानभूत् |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय १२२
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारस्ततो राजन्सर्वसैन्येषु चाभवत् ||
६५ ख
शल्य पर्व
अध्याय १९
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारैर्नादय़न्तः स्म युद्धे; द्विपं समन्ताद्रुरुधुर्नराग्र्याः ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महांस्तत्र सैन्यानां समजाय़त |
५४ क
शल्य पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महाञ्जज्ञे योधानां तव भारत ||
४३ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ९१
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्तव सैन्यस्य मारिष ||
३२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ७७
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्तव सैन्ये विशां पते |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्त्रिगर्तानां जनेश्वर |
२९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्पाञ्चालानां महाहवे ||
३८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्पाञ्चालानां विशां पते |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्पाण्डुसैन्येषु भारत ||
५९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४९
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्सर्वसैन्यस्य भारत |
१० क
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
हाहाकारो महानासीत्सैन्यानां भरतर्षभ ||
६३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११७
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीत्सैन्यानां भरतर्षभ |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीद्दृष्ट्वा दिव्यास्त्रधारिणौ |
४७ क
शल्य पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
हाहाकारो महानासीद्देवदानवरक्षसाम् |
४१ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीद्योधानां युधि युध्यताम् |
५० क
भीष्म पर्व
अध्याय ४१
सञ्जय़ उवाच
हाहाकारो महानासीन्निःशव्दास्त्वपरेऽभवन् ||
२० ख
भीष्म पर्व
अध्याय १०८
सञ्जय़ उवाच
हाहाकिलकिलाशव्दाः श्रूय़न्ते च चमूमुखे |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
हाहाकृतं तद्धनुषा दृढेन; निष्पिष्टभग्नाङ्गदकुण्डलं च |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
हाहाकृतं भृशं तस्थौ लीय़मानं परस्परम् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५४
सञ्जय़ उवाच
हाहाकृतं सम्परिवर्तमानं; संलीय़मानं च विषण्णरूपम् |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
हाहाकृतमभूत्सर्वं जङ्गमं स्थावरं तथा |
११४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५७
अश्व उवाच
हाहाकृतमभूत्सर्वमैरावतनिवेशनम् |
४७ क
वन पर्व
अध्याय १९
वासुदेव उवाच
हाहाकृतमभूत्सार्वं वृष्ण्यन्धकवलं तदा |
२ क
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
हाहाकृतमभूत्सैन्यं शाल्वस्य पृथिवीपते |
१९ क
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
हाहाकृता द्विजाश्चैव भय़ार्ता वृषलार्दिताः |
५८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७०
सञ्जय़ उवाच
हाहाकृतानि भूतानि पाण्डवाश्च विशेषतः |
६१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
हाहाकृतानि भूतानि मानुषाणीतराणि च |
३७ क
वन पर्व
अध्याय २७४
मातलिरु उवाच
हाहाकृतानि भूतानि रावणे समभिद्रुते |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
भीम उवाच
हाहाकृताश्चैव रणे विशोक; मुञ्चन्ति नादान्विपुलान्गजेन्द्राः ||
२४ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
हाहाभूतं च तत्सर्वमासीन्नगरमार्तिमत् ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ९२
सञ्जय़ उवाच
हाहाभूतं जगच्चासीद्दृष्ट्वा राजानमाहवे |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ६७
वृहदश्व उवाच
हाहाभूतमतीवासीद्भृशं च प्ररुरोद ह ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय २३
वासुदेव उवाच
हाहाभूता दिशो जग्मुरर्दिता मम साय़कैः ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
हाहाभूता भय़ार्ता च निवृत्तविपणापणा |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७४
भीष्म उवाच
हाहाभूते प्रवृत्ते तु नादे लोकभय़ङ्करे |
४२ क
वन पर्व
अध्याय ६२
वृहदश्व उवाच
हाहारवं प्रमुञ्चन्तः सार्थिकाः शरणार्थिनः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३११
भीष्म उवाच
हाहाहूहू च गन्धर्वौ तुष्टुवुः शुकसम्भवम् ||
१५ ख
आदि पर्व
अध्याय १५२
वैशम्पाय़न उवाच
हिंसतां हि वधः शीघ्रमेवमेव भवेदिति ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७८
देव्यु उवाच
हिंसनीय़स्त्वय़ा नैष मम पुत्रत्वमागतः |
३५ क
वन पर्व
अध्याय २५७
वैशम्पाय़न उवाच
हिंसा च मृगजातीनां वनौकोभिर्वनौकसाम् |
९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २८
यतिरु उवाच
हिंसा निर्वेष्टुकामानामिन्धनं पशुसञ्ज्ञितम् ||
१५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
हिंसा वलमसाधूनां क्षमा गुणवतां वलम् ||
५५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३४
विदुर उवाच
हिंसा वलमसाधूनां राज्ञां दण्डविधिर्वलम् |
७२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
हिंसात्मकानि कर्माणि नाय़ुरिच्छेत्पराय़ुषा ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भृगुरु उवाच
हिंसानृतप्रिय़ा लुव्धाः सर्वकर्मोपजीविनः |
१३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४९
व्रह्मो उवाच
हिंसापराश्च ये लोके ये च नास्तिकवृत्तय़ः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
हिंसापरो घृणाहीनः सदा प्राणिवधे रतः |
३६ क