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शान्ति पर्व
अध्याय १४२
भीष्म उवाच
हर्षेण महता युक्तो वाष्पव्याकुललोचनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय २४२
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षेण महता युक्तो विदुरं प्रत्यभाषत ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय १६२
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षेण महताविष्टः फल्गुनस्याथ दर्शनात् ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षेण वाध्यते शोको हर्षः शोकेन वाध्यते ||
१३ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
हर्षेण वाध्यते शोको हर्षः शोकेन वाध्यते |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
हर्षेणोत्फुल्लनय़नः कृपमाभाष्य सत्वरम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ४४
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षेणोत्फुल्लनय़नो न चातृप्यत वृत्रहा ||
२६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ४
व्यास उवाच
हर्षो योधगणस्यैकं जय़लक्षणमुच्यते ||
२६ ख
विराट पर्व
अध्याय २१
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षोन्मथितचित्तात्मा स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||
४३ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय १
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षोऽभवच्च सर्वेषां भ्रातॄणां गमनं प्रति |
२२ क
वन पर्व
अध्याय १५७
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षय़न्पर्वतस्याग्रमाससाद महावलः ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
हर्षय़न्पाण्डवान्योधान्भीमसेनपुरोगमान् ||
३६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षय़न्सर्वशः पौरान्विवेश गजसाह्वय़म् ||
२७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
हर्षय़न्सर्वसैन्यानि वलेषु वलमादधत् |
८ क
वन पर्व
अध्याय १५८
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षय़ामासुरन्योन्यमिङ्गितैर्विजय़ावहैः ||
२५ ख
वन पर्व
अध्याय २१
वासुदेव उवाच
हर्षय़ामासुरुच्चैर्मां सिंहनादतलस्वनैः ||
२६ ख
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षय़िष्यन्स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वय़म् ||
१९ ख
विराट पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
हर्षय़ुक्तस्तथा पार्थः प्रहसन्निव वीर्यवान् |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय १००
भीष्म उवाच
हर्षय़ेय़ुर्विषण्णांश्च व्यवस्थाप्य परस्परम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय २७०
मार्कण्डेय़ उवाच
हरय़ो जातविस्रम्भा जघ्नुरभ्येत्य सैनिकान् ||
१५ ख
वन पर्व
अध्याय २७२
मार्कण्डेय़ उवाच
हरय़ो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
भीष्म उवाच
हलकृष्टां महीं दत्त्वा सवीजां सफलामपि |
२८ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
हलस्य करणे चापि व्यादिष्टाः सर्वशिल्पिनः |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ७२
व्रह्मो उवाच
हलस्य वोढारमनन्तवीर्यं; प्राप्नोति लोकान्दशधेनुदस्य ||
४३ ख
आदि पर्व
अध्याय १७८
वैशम्पाय़न उवाच
हलाय़ुधस्तत्र च केशवश्च; वृष्ण्यन्धकाश्चैव यथा प्रधानाः |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय ५३
वैशम्पाय़न उवाच
हलाय़ुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महावलः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५
वैशम्पाय़न उवाच
हविः श्वा प्रपिवेद्धृष्टो दण्डश्चेन्नोद्यतो भवेत् |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
हविःपवित्रभोज्येन देव भोज्येन चैव ह |
६ क
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
हविःश्रवास्तथेन्द्राभः सुमन्युश्चापराजितः ||
५१ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
हविध्रश्च पृषध्रश्च प्रतीपः शन्तनुस्तथा |
५० क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ७
द्रौणिरु उवाच
हविरात्मवतश्चात्मा तस्मिन्भारत कर्मणि ||
५१ ख
आदि पर्व
अध्याय ८४
यय़ातिरु उवाच
हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमे; र्धूमापाङ्गं प्रतिगृह्य प्रतीतः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
हविर्धानं तु तस्याहुः परेषां वाहिनीमुखम् |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
हविर्धानं स्ववाहिन्यस्तदस्याहुर्मनीषिणः ||
३६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २०
वासुदेव उवाच
हविर्भूता गुणाः सर्वे प्रविशन्त्यग्निजं मुखम् |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
स्यूमरश्मिरु उवाच
हविर्भूमिर्दिशः श्रद्धा कालश्चैतानि द्वादश ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३६
भीष्म उवाच
हविर्यज्ञेषु च वहन्भूय़ एवाभिशोभते ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
हविर्यत्संस्कृतं मन्त्रैः प्रोक्षिताभ्युक्षितं शुचि |
५० क
वन पर्व
अध्याय २१०
मार्कण्डेय़ उवाच
हविर्वेद्यां तदादानं कुशलैः सम्प्रवर्तितम् |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३९
विदुर उवाच
हविर्व्राह्मणकाम्या च गुरोर्वचनमौषधम् ||
५६ ख
सभा पर्व
अध्याय ३४
शिशुपाल उवाच
हविषः प्राप्य निष्यन्दं प्राशितुं श्वेव निर्जने ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १०१
शुक्र उवाच
हविषा प्रथमः कल्पो द्वितीय़स्त्वौषधीरसैः |
५१ क
वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
हविषा यो द्वितीय़ेन सोमेन सह युज्यते |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ७०
युधिष्ठिर उवाच
हविषाग्निर्यथा कृष्ण भूय़ एवाभिवर्धते ||
६३ ख
सभा पर्व
अध्याय ७
नारद उवाच
हविष्मांश्च गविष्ठश्च हरिश्चन्द्रश्च पार्थिवः |
११ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
व्रह्मो उवाच
हविष्यभैक्ष्यभुक्चापि स्थानासनविहारवान् ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
हविस्तु रुधिरं कृष्ण अस्मिन्यज्ञे भविष्यति ||
३९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ९९
इन्द्र उवाच
हवींषि परमांसानि रुधिरं त्वाज्यमेव च ||
१५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८८
भीष्म उवाच
हवींषि श्राद्धकल्पे तु यानि श्राद्धविदो विदुः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३६
व्यास उवाच
हवींषि सम्प्रय़च्छेत मखेष्वत्रापि पञ्चसु ||
७ ख