शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
संवत्सरेण मासाशी पूय़ते नात्र संशय़ः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२७८
राजो उवाच
संवत्सरेण सोऽल्पाय़ुर्देहन्यासं करिष्यति ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ||
२२ ख
आदि पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
संवरणः खलु वैवस्वतीं तपतीं नामोपय़ेमे |
४० क
विराट पर्व
अध्याय
४
धौम्य उवाच
संवर्णय़ेत्तदेवास्य प्रिय़ादपि हितं वदेत् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
संवर्तकाग्निप्रतिमां ज्वलन्तीं; कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्राम् ||
४३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
भीष्म उवाच
संवर्ततामित्युवाच मुनिर्मधुरय़ा गिरा ||
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
८३
पुलस्त्य उवाच
संवर्तस्य तु विप्रर्षेर्वापीमासाद्य दुर्लभाम् |
२८ क
सभा पर्व
अध्याय
७
नारद उवाच
संवर्तो देवहव्यश्च विष्वक्सेनश्च वीर्यवान् ||
१६ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१०
मरुत्त उवाच
संवर्तो मां याजय़िताद्य राज; न्न ते वाक्यं तस्य वा रोचय़ामि ||
६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
संवर्तो मां याजय़ितेत्यभीक्ष्णं; पुनः पुनः स मय़ा प्रोच्यमानः ||
२२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
संवर्तो याजय़ामास यं पीडार्थं वृहस्पतेः ||
१७ ग
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
मरुत्त उवाच
संवर्तोऽय़ं याजय़िता द्विजो मे; वृहस्पतेरञ्जलिरेष तस्य |
१६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
संवर्धता गोपकुले वालेनैव महात्मना |
२ क
सभा पर्व
अध्याय
२२
वैशम्पाय़न उवाच
संवर्धितौजसो भूय़ः कर्मणा तेन भारत |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
२६३
मार्कण्डेय़ उवाच
संवसत्यत्र सुग्रीवश्चतुर्भिः सचिवैः सह |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
संवसत्येव दुर्वुद्धिरसत्सु विषय़ेष्वपि ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
संवसन्तः प्रिय़ैर्दारैर्भुञ्जानाश्चान्नमुत्तमम् ||
४७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
भीष्म उवाच
संवाद इत्ययं श्रेष्ठः साध्यानां परिकीर्तितः |
४५ क
आदि पर्व
अध्याय
४६
जनमेजय़ उवाच
संवादं पन्नगेन्द्रस्य काश्यपस्य च यत्तदा ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
भीष्म उवाच
संवादं भरतश्रेष्ठ शल्मलेः पवनस्य च ||
१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१
भीष्म उवाच
संवादं मृत्युगौतम्योः काललुव्धकपन्नगैः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०३
भीष्म उवाच
संवादं मोक्षसंय़ुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
वासुदेव उवाच
संवादं मोक्षसंय़ुक्तं शिष्यस्य गुरुणा सह ||
२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
भीष्म उवाच
संवादं वासुदेवस्य पृथ्व्याश्च भरतर्षभ ||
१९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४०
सञ्जय़ उवाच
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ||
७४ ख
आदि पर्व
अध्याय
२
सूत उवाच
संवादश्च ततः पर्व द्रौपदीसत्यभामय़ोः ||
४५ ख
सभा पर्व
अध्याय
६५
धृतराष्ट्र उवाच
संवादे परुषाण्याहुर्युधिष्ठिर नराधमाः |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१९३
युधिष्ठिर उवाच
संवादो वा तय़ोः कोऽभूत्किं वा तौ तत्र चक्रतुः ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
संवादोऽय़ं महानासीद्विष्णुं प्रति महाद्युते ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४६
सञ्जय़ उवाच
संवार्य तान्वाणगणैर्युधि राजन्धनञ्जय़ः |
३० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१५
सञ्जय़ उवाच
संवार्य तु रणे द्रोणः कुमारं वै महावलः |
२४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
११०
सञ्जय़ उवाच
संवार्याधिरथिं वाणैर्यज्जघान तवात्मजान् ||
३७ ख
आदि पर्व
अध्याय
१४३
वैशम्पाय़न उवाच
संवाससमय़ो जीर्ण इत्यभाषत तं ततः |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३७
व्रह्मदत्त उवाच
संवासाज्जाय़ते स्नेहो जीवितान्तकरेष्वपि |
३६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
५०
भीष्म उवाच
संवासान्नोत्सहे त्यक्तुं सलिलाध्युषितानिमान् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
५२
भीष्म उवाच
संवाहितव्यौ पादौ मे जागर्तव्यं च वां निशि ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
९०
वैशम्पाय़न उवाच
संविच्च धार्तराष्ट्राणां सर्वेषामेव केशव |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
संविधातुं न शक्नोमि मित्राणां वा जनार्दन ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५३
सञ्जय़ उवाच
संविधानं च विहितं रथाश्च किल सज्जिताः ||
२५ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
११
वैशम्पाय़न उवाच
संविधानं महाप्राज्ञस्तत्र चक्रे जनार्दनः ||
१६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
संवर्त उवाच
संविधास्ये च ते राजन्नक्षय़ं द्रव्यमुत्तमम् |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
१६६
अर्जुन उवाच
संविधाय़ पुरे रक्षां न स्म कश्चन दृश्यते ||
१० ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
संविधाय़ यथादिष्टं यथादेशप्रदर्शनम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
संविभक्ता च दाता च भोगवान्सुखवान्नरः |
२३ क
वन पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
संविभक्ता हि मात्राभिर्भोगैरपि च सर्वशः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
३८
वैशम्पाय़न उवाच
संविभक्ताश्च तुष्टाश्च गुरुवत्तेषु वर्तते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
संविभक्ताश्च सत्कृत्य मामकान्तरमाविशः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
७८
राजो उवाच
संविभक्तास्मि सर्वेषां मामकान्तरमाविशः ||
१८ ख