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आदि पर्व
अध्याय २९
सूत उवाच
स वव्रे तव तिष्ठेय़मुपरीत्यन्तरिक्षगः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १०६
लोमश उवाच
स वव्रे तुरगं तत्र प्रथमं यज्ञकारणात् |
२४ क
वन पर्व
अध्याय २५९
मार्कण्डेय़ उवाच
स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय ११६
अकृतव्रण उवाच
स वव्रे मातुरुत्थानमस्मृतिं च वधस्य वै |
१७ क
विराट पर्व
अध्याय १७
द्रौपद्यु उवाच
स वशे विवशो राजा परेषामद्य वर्तते ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स वसंस्तत्रोपाध्याय़स्त्रीभिः सहिताभिराहूय़ोक्तः |
८९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
स वसातीञ्शिवींश्चैव वाह्लीकान्कौरवानपि |
२४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
स वहिर्दिवसानेवं जनौघं परिपालय़न् |
२६ क
वन पर्व
अध्याय ७४
वृहदश्व उवाच
स वा प्रवेश्यतां मातर्मां वानुज्ञातुमर्हसि |
४ क
वन पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
स वाक्यं भीमसेनस्य स्मितेन प्रतिगृह्य तत् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
अतिथिरु उवाच
स वाचा कर्मणा चैव मनसा च द्विजर्षभ |
५ क
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
स वाचा प्रणतस्तस्य कर्मणा चैव भारत ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय ९८
लोमश उवाच
स वाच्यः सहितैः सर्वैर्भवद्भिर्जय़काङ्क्षिभिः |
९ क
वन पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
स वाच्यो मम सन्देशाद्धर्मात्मा सत्यसङ्गरः |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
स वाजिरथमातङ्गान्निघ्नन्व्यचरदर्जुनः |
५२ क
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
स वाणवर्षं सुमहदसृजत्पार्षतं प्रति |
४० क
आदि पर्व
अध्याय ९०
वैशम्पाय़न उवाच
स वाणविद्ध उवाच पाण्डुम् |
६५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६६
कृष्ण उवाच
स वाणसङ्घान्धनुषा व्यवासृज; न्विभाति कर्णः शरजालरश्मिवान् |
४० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७८
वैशम्पाय़न उवाच
स वाणस्तेजसा दीप्तो ज्वलन्निव हुताशनः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
स वाद्य मां नेष्यति कृच्छ्रमेत; त्कर्णस्यान्तादेतदन्ताः स्थ सर्वे ||
३८ ख
वन पर्व
अध्याय २६०
अग्निरु उवाच
स वाधते प्रजाः सर्वा विप्रकारैर्महावलः |
३ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५
व्यास उवाच
स वाध्यमानः सततं भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत |
६ क
वन पर्व
अध्याय २६७
मार्कण्डेय़ उवाच
स वानरमहालोकः पूर्णसागरसंनिभः |
१३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८०
सञ्जय़ उवाच
स वानरवरो राजन्पताकाभिरलङ्कृतः |
९ क
कर्ण पर्व
अध्याय ३७
सञ्जय़ उवाच
स वानरवरो राजन्विश्वकर्मकृतो महान् |
८ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७४
वैशम्पाय़न उवाच
स वारणं नगप्रख्यं प्रभिन्नकरटामुखम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५७
सञ्जय़ उवाच
स वारणरथौघानां सहस्रैर्वहुभिर्वृतः |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन्भरतसत्तम |
७ क
आदि पर्व
अध्याय १४८
व्राह्मण उवाच
स वारो वहुभिर्वर्षैर्भवत्यसुतरो नरैः ||
७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
स वार्यमाणो भीमेन शितैर्वाणैः समन्ततः |
३८ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
स वार्यमाणो रथिभी रक्षितेन मय़ा तथा |
३ क
कर्ण पर्व
अध्याय ६२
सञ्जय़ उवाच
स वार्यमाणो विशिखैः समन्तात्तैर्महारथैः |
४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५३
सञ्जय़ उवाच
स वार्ष्णेय़वचः श्रुत्वा कर्णमुत्सृज्य वीर्यवान् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय ४४
सूत उवाच
स वाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितवुद्धिमान् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय ९७
लोमश उवाच
स वाल एव तेजस्वी पितुस्तस्य निवेशने |
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय ४०
सूत उवाच
स वाल एवार्यमतिर्नृपोत्तमः; सहैव तैर्मन्त्रिपुरोहितैस्तदा |
७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २८
भीष्म उवाच
स वालं गर्दभं राजन्वहन्तं मातुरन्तिके |
९ क
वन पर्व
अध्याय २७८
मार्कण्डेय़ उवाच
स वालवत्सय़ा सार्धं भार्यया प्रस्थितो वनम् |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २
वैशम्पाय़न उवाच
स वालस्तेजसा युक्तः सूतपुत्रत्वमागतः |
५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
स वासवसमः सङ्ख्ये वासवस्यात्मजात्मजः |
२४ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
स वासुदेवः प्रगृहीतचक्रः; संवर्तय़िष्यन्निव जीवलोकम् |
९२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६९
भीष्म उवाच
स वासुदेवेन समुद्धृतश्च; पृष्टश्च कामान्निजगाद राजा |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
भीष्म उवाच
स वासुदेवो विज्ञेय़ः परमात्मा सनातनः ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
स वाहुभ्यां विनिग्राह्यो लोकय़ात्राविघातकः ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
स वाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे; न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेय़म् |
६५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११८
सञ्जय़ उवाच
स वाहुरपतद्भूमौ सखड्गः सशुभाङ्गदः |
१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३०
युधिष्ठिर उवाच
स वाह्लिकानामृषभो मनस्वी; पुरा यथा माभिवदेत्प्रसन्नः ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१६
भीष्म उवाच
स वाय़ुर्वरुणश्चैव स रविः स च चन्द्रमाः |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय १७३
व्यास उवाच
स वाय़ुर्विषमस्थेषु प्राणापानशरीरिषु ||
९३ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
स वाय़ुवेगप्रतिमो वाय़ुवेगसमो जवे |
२५ क