अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
स यज्ञारिः स कामारिर्महादंष्ट्रो महाय़ुधः ||
९८ ख
वन पर्व
अध्याय
२०९
मार्कण्डेय़ उवाच
स यज्ञे विश्वभुङ्नाम सर्वलोकेषु भारत ||
१७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
स यज्ञेऽस्मिन्नवभृथो भविष्यति जनार्दन ||
५१ ख
वन पर्व
अध्याय
२६७
मार्कण्डेय़ उवाच
स यत्काष्ठं तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मय़ि |
४२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१६
धृतराष्ट्र उवाच
स यत्तत्राकरोत्पार्थस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय़ ||
३ ख
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
स यत्नमकरोत्तीव्रं मोक्षार्थं हव्यवाहनात् ||
५ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१९१
भीष्म उवाच
स यत्नमकरोत्तीव्रं सम्वन्धैरनुसान्त्वनैः |
२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२५
श्रीभगवानु उवाच
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ||
२१ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
स यत्रेच्छसि विदुर तत्र गच्छ; सुसान्त्वितापि ह्यसती स्त्री जहाति ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
७७
वासुदेव उवाच
स यथा जीवितं जह्यात्तथा कुरु धनञ्जय़ ||
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
उतथ्य उवाच
स यथा दर्पसहितमधर्मं नानुसेवसे |
२६ क
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
स यथा प्रेरय़त्येनं तथाय़ं कुरुतेऽवशः ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९१
भीष्म उवाच
स यथानुशशासैनमुतथ्यो व्रह्मवित्तमः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०६
सञ्जय़ उवाच
स यथावन्महाराज विद्यया वै सुपूजितः |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
स यथाशास्त्रदृष्टेन मार्गेणेह परिव्रजन् |
२६ क
आदि पर्व
अध्याय
१२४
वैशम्पाय़न उवाच
स यथासमय़ं चक्रे वलिं वलवतां वरः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१०
धृतराष्ट्र उवाच
स यदा तात संनह्येत्पाण्डवार्थाय़ केशवः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२४३
व्यास उवाच
स यदा सर्वतो मुक्तः समः पर्यवतिष्ठते |
२२ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
स यदि कथञ्चिदभिजानीय़ादिमं राजानं तमकूपारं पृच्छाम इति ||
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
८६
वैशम्पाय़न उवाच
स यद्व्रूय़ान्महावाहुस्तत्कार्यमविशङ्कय़ा |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
७४
शुक्र उवाच
स यन्तेत्युच्यते सद्भिर्न यो रश्मिषु लम्वते ||
२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
६
विदुर उवाच
स यस्तु कूपवीनाहे तं वृक्षं परिसर्पति |
९ क
शल्य पर्व
अध्याय
२३
सञ्जय़ उवाच
स यात्वा वाहिनीं तूर्णमव्रवीत्त्वरय़न्युधि |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
स यात्वितो यथाकामं वसतां वा यथासुखम् ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७१
भीष्म उवाच
स यावदेवास्ति सशेषभुक्ते; प्रजाश्च देव्यौ च तथैव शुक्ले |
५४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३०४
याज्ञवल्क्य उवाच
स युक्तः पश्यति व्रह्म यत्तत्परममव्ययम् |
२५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स युद्धकुशलः पार्थो वाहुवीर्येण चान्वितः |
५ क
वन पर्व
अध्याय
११६
अकृतव्रण उवाच
स युद्धमदसंमत्तो नाभ्यनन्दत्तथार्चनम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
स युद्धे धृतिमास्थाय़ यत्तो युध्यस्व पाण्डवैः |
२० क
शल्य पर्व
अध्याय
२०
सञ्जय़ उवाच
स युद्धे युय़ुधानेन हताश्वो हतसारथिः |
२५ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
वैशम्पाय़न उवाच
स युद्ध्वा क्षत्रधर्मेण यथा नान्यः पुमान्क्वचित् |
१७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
४५
सञ्जय़ उवाच
स युध्यमानः पृतनामुखस्था; ञ्शूराञ्शूरो हर्षय़न्सव्यसाची |
५६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०५
सञ्जय़ उवाच
स युध्यमानो वहुभिर्भीष्मः शान्तनवस्तदा |
३६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१७
सञ्जय़ उवाच
स युध्यस्व मय़ा शक्त्या विनेष्ये दर्पमद्य ते ||
५४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
वासुदेव उवाच
स युवा वृषभस्कन्धो दीर्घवाहुर्महावलः |
१६ क
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
स युवाभ्यां सहाय़ाभ्यामस्त्रविद्भ्यां समागतः |
१० क
द्रोण पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
स यूपः काञ्चनो राजन्सौमदत्तेर्विराजते |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
९९
इन्द्र उवाच
स यूपस्तस्य शूरस्य खादिरोऽष्टाश्रिरुच्यते ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय
१९२
विष्णुरु उवाच
स योगवलमास्थाय़ मामकं पार्थिवोत्तमः |
२८ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३३
वैशम्पाय़न उवाच
स योगवलमास्थाय़ विवेश नृपतेस्तनुम् |
२६ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२७
श्रीभगवानु उवाच
स योगी व्रह्मनिर्वाणं व्रह्मभूतोऽधिगच्छति ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
स योत्स्यति हि विक्रम्य मघवानिव दानवैः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१६८
भीष्म उवाच
स योत्स्यतीह विक्रम्य समरे तव सैनिकैः ||
१९ ग
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
स यय़ौ घोररूपेण तेन जैत्रपताकिना |
१०२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स यय़ौ घोररूपेण रथेन रथिनां वरः |
८९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
स रक्षमाणस्त्वण्डानि कुलिङ्गानां यतव्रतः |
२८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
स रक्ष्यमाणः पार्थेन तथास्माभिर्विवर्जितः |
२२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
स रणे व्यचरत्तूर्णं प्रेक्षणीय़ो धनञ्जय़ः ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१२१
सञ्जय़ उवाच
स रणे व्यचरत्पार्थः प्रेक्षणीय़ो धनञ्जय़ः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स रत्नानि विचित्राणि सम्भृतानि ततस्ततः |
२५ क