शल्य पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स महात्मा महात्मानं भीमं भीमपराक्रमः |
५८ क
वन पर्व
अध्याय
२७१
मार्कण्डेय़ उवाच
स महात्मा महावेगः कुम्भकर्णस्य मूर्धनि |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१३
वैशम्पाय़न उवाच
स महाधनरत्नौघो वस्त्रकम्वलफेनवान् |
५० क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२७
वैशम्पाय़न उवाच
स महानिय़मो नाम तपश्चर्या सुदारुणा ||
४० ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६५
सञ्जय़ उवाच
स महास्त्रैर्महाराज द्रोणमाच्छादय़द्रणे |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७८
भीष्म उवाच
स महाय़ोगिनो वुद्ध्वा तं रोषं वै महात्मनः |
१५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स महेन्द्रः स्तूय़ते वै महाध्वरे; विप्रैरेको ऋक्सहस्रैः पुराणैः ||
२६ ख
वन पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
स मा जिह्मं विदुर सर्वं व्रवीषि; मानं च तेऽहमधिकं धारय़ामि |
१९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
६
युधिष्ठिर उवाच
स मां त्वं यदि राजेन्द्र परित्यज्य गमिष्यसि |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय
६५
शकुन्तलो उवाच
स मां न च्यावय़ेत्स्थानात्तं वै गत्वा प्रलोभय़ |
२५ क
आदि पर्व
अध्याय
१२२
वैशम्पाय़न उवाच
स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमव्रवीत् ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११७
सञ्जय़ उवाच
स मां निहन्यात्सङ्ग्रामे यो मां कुर्यान्निराय़ुधम् |
१५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
१०३
सञ्जय़ उवाच
स मां निय़ुङ्क्ष्व राजेन्द्र यावद्द्वीपो भवाम्यहम् ||
३४ ग
आदि पर्व
अध्याय
२१५
वैशम्पाय़न उवाच
स मां प्रज्वलितं दृष्ट्वा मेघाम्भोभिः प्रवर्षति |
९ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
स मां प्रतीक्षते व्यक्तं शाल्वराजो विशां पते |
९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
स मां प्रसाद्य देवेन्द्रः पुनरेवेदमव्रवीत् ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
स मां प्राकारकर्णं चोलूकं यथोचिते स्थाने प्रतिपाद्य तेनैव यानेन संसिद्धो यथोचितं स्थानं प्रतिपन्नः ||
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
स मां मित्रत्वमापन्नमुपभोक्तुं त्वमर्हसि ||
१२२ ख
वन पर्व
अध्याय
३३
द्रौपद्यु उवाच
स मां राजन्कर्मवतीमागतामाह सान्त्वय़न् |
५८ क
विराट पर्व
अध्याय
१७
द्रौपद्यु उवाच
स मां सैरन्ध्रिवेषेण वसन्तीं राजवेश्मनि |
८ क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
स मांसरुधिरौघैश्च मेदौघैश्च समीरितः |
३२ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१३
सञ्जय़ उवाच
स मागधानां प्रवरोऽङ्कुशग्रहो; ग्रहेष्वसह्यो विकचो यथा ग्रहः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
५७
वैशम्पाय़न उवाच
स मातरमुपस्थाय़ तपस्येव मनो दधे |
७० क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४३
भीष्म उवाच
स मातरिश्वा विभुरश्ववाजी; स रश्मिमान्सविता चादिदेवः ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
स मातुर्वचनाकाङ्क्षी प्रविवेश सभां पुनः |
१७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
स माधवमनुज्ञाय़ कुरुष्वेति धनञ्जय़ः |
५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११५
भीष्म उवाच
स मानवः श्ववल्लोके नष्टलोकपराय़णः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
५०
वृहदश्व उवाच
स मानुषीं गिरं कृत्वा दमय़न्तीमथाव्रवीत् ||
२५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स मान्धातुर्देवदेवोपदिष्टं; सम्यग्धर्मं धारय़ामास राजा ||
२९ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८३
वैशम्पाय़न उवाच
स मान्यतां नरश्रेष्ठः स हि धर्मः सनातनः |
७ क
वन पर्व
अध्याय
१७८
सर्प उवाच
स मामपनय़ो राजन्भ्रंशय़ामास वै श्रिय़ः ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
स मामपृच्छत्कौन्तेय़ क्वासि गन्ता व्रवीहि मे |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१७८
भीष्म उवाच
स मामभिगतं दृष्ट्वा जामदग्न्यः प्रतापवान् |
४ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७
मरुत्त उवाच
स मामभिगतं प्रेम्णा याज्यवन्न वुभूषति |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
४३
दुर्योधन उवाच
स मामभ्यनुजानीहि मातुलाद्य सुदुःखितम् |
३६ क
वन पर्व
अध्याय
१६३
अर्जुन उवाच
स मामभ्येत्य समरे तथैवाभिमुखं स्थितम् |
४३ क
वन पर्व
अध्याय
१९१
वैशम्पाय़न उवाच
स मामश्वो भूत्वा तत्रावहद्यत्र वभूवोलूकः ||
५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
स मामुवाच तिग्मांशुर्वृथाह्वानं न ते क्षमम् |
११ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
स मामुवाच तेजस्वी कृपय़ाभिपरिप्लुतः |
१९ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५४
वैशम्पाय़न उवाच
स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१६४
अर्जुन उवाच
स मामुवाच राजेन्द्र प्रीय़माणो द्विजोत्तमः |
४ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
स मामुवाच वेपन्तीं वरं मत्तो वृणीष्व ह |
१० क
आदि पर्व
अध्याय
२१९
वैशम्पाय़न उवाच
स मारुत इवाभ्राणि नाशय़ित्वार्जुनः सुरान् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५०
सञ्जय़ उवाच
स मार्गणगणैः कर्णो दिशः प्रच्छाद्य सर्वशः |
७२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१४१
सञ्जय़ उवाच
स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वतः |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१३१
सञ्जय़ उवाच
स मार्गणगणैर्द्रौणिर्दिशः प्रच्छाद्य सर्वतः |
७३ क
आदि पर्व
अध्याय
२२०
वैशम्पाय़न उवाच
स मार्गमास्थितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३२९
श्रीभगवानु उवाच
स मार्तण्डो विवस्वानभवच्छ्राद्धदेवः ||
४४ क
आदि पर्व
अध्याय
१४२
वैशम्पाय़न उवाच
स मार्यमाणो भीमेन ननाद विपुलं स्वनम् |
२९ क
वन पर्व
अध्याय
२६४
मार्कण्डेय़ उवाच
स मालय़ा तदा वीरः शुशुभे कण्ठसक्तय़ा |
३४ क