वन पर्व
अध्याय
१७७
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्मराजमालक्ष्य भ्राता भ्रातरमग्रजम् |
३ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८१
सञ्जय़ उवाच
स धर्मराजस्य वचो निशम्य; रूक्षाक्षरं विप्रलापानुवद्धम् |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स धर्मराजो निहताश्वसूतं; क्रोधेन दीप्तज्वलनप्रकाशम् |
३५ क
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स धर्मराजो निहताश्वसूते; रथे तिष्ठञ्शक्तिमेवाभिकाङ्क्षन् ||
३६ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१६
सञ्जय़ उवाच
स धर्मराजो मणिहेमदण्डां; जग्राह शक्तिं कनकप्रकाशाम् |
३८ क
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्मराजो मेधावी शङ्कमानो महद्भय़म् |
४६ क
वन पर्व
अध्याय
१८८
मार्कण्डेय़ उवाच
स धर्मविजय़ी राजा चक्रवर्ती भविष्यति |
९१ क
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्मशास्त्रकुशलो भीष्मं शान्तनवं नृपः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६५
भीष्म उवाच
स धर्मस्य फलं लव्ध्वा न तृप्यति युधिष्ठिर |
१८ क
आदि पर्व
अध्याय
१००
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्मस्यानृणो भूत्वा पुनर्मात्रा समेत्य च |
२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१२३
कामन्द उवाच
स धर्मार्थपरित्यागात्प्रज्ञानाशमिहार्छति ||
१४ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
भीष्म उवाच
स धर्मो धर्मवेलाय़ां भवत्यभिहितः परैः ||
१५ ख
सभा पर्व
अध्याय
१२
वैशम्पाय़न उवाच
स धर्म्यं पाण्डवस्तेषां वचः श्रुत्वा विशां पते |
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१४५
वासुदेव उवाच
स धाता स विधाता च विश्वकर्मा स सर्ववित् |
३९ क
वन पर्व
अध्याय
१२०
सात्यकिरु उवाच
स धार्तराष्ट्रं जहि सानुवन्धं; वृत्रं यथा देवपतिर्महेन्द्रः ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
स धारय़ञ्शरान्हेमपुङ्खानपि महावलः |
१६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२००
भीष्म उवाच
स धारय़ति भूतात्मा उभे भूतभविष्यती ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
३५
व्रह्मो उवाच
स धीरः सर्वभूतेषु न मोहमधिगच्छति ||
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४०
व्रह्मो उवाच
स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति |
८ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५०
व्रह्मो उवाच
स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति ||
६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९४
सञ्जय़ उवाच
स ध्यात्वा सुचिरं कालं दुःखरोषसमन्वितः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५३
वैशम्पाय़न उवाच
स ध्यानपथमाश्रित्य सर्वज्ञानानि माधवः |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
३९
सञ्जय़ उवाच
स ध्वजं कार्मुकं चास्य छित्त्वा भूमौ न्यपातय़त् ||
२९ ग
भीष्म पर्व
अध्याय
१९
सञ्जय़ उवाच
स नः पुरो योत्स्यति वै भीमः प्रहरतां वरः ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय
३३
सूत उवाच
स नः प्रक्ष्यति सर्वेषु कार्येष्वर्थविनिश्चय़म् |
१३ क
स्त्री पर्व
अध्याय
२७
वैशम्पाय़न उवाच
स नः प्रथमजो भ्राता सर्वशस्त्रभृतां वरः |
१६ ख
विराट पर्व
अध्याय
२४
वैशम्पाय़न उवाच
स नः शाधि मनुष्येन्द्र अत ऊर्ध्वं विशां पते ||
१७ ग
उद्योग पर्व
अध्याय
७०
युधिष्ठिर उवाच
स नः स्वधर्मोऽधर्मो वा वृत्तिरन्या विगर्हिता ||
४६ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
स नगो वेश्मसङ्कीर्णो देवलोक इवावभौ ||
१३ ग
वन पर्व
अध्याय
७०
वृहदश्व उवाच
स नदीः पर्वतांश्चैव वनानि च सरांसि च |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५३
भीष्म उवाच
स नद्यां समुपस्पृश्य तर्पय़ित्वा हुताशनम् |
४० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१११
सञ्जय़ उवाच
स नन्दय़न्रणे पार्थं केशवं च यशस्विनम् |
३४ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच |
१४ क
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
५
सूत उवाच
स नरः पापनिर्मुक्तः कीर्तिं प्राप्येह शौनक |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
६७
वृहदश्व उवाच
स नरः सर्वथा ज्ञेय़ः कश्चासौ क्व च वर्तते ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय
७२
वाहुक उवाच
स नले विद्रुते भद्रे भाङ्गस्वरिमुपस्थितः ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
२३९
वैशम्पाय़न उवाच
स नश्यति श्रिय़ं प्राप्य पात्रमाममिवाम्भसि ||
३ ग
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
स नष्टः कौरवेय़ेषु पूर्वो धर्मः सनातनः ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय
१२
विदुर उवाच
स नष्टमाय़ोऽतिवलः क्रोधविस्फारितेक्षणः |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स नाग इव नागेन गोवृषेणेव गोवृषः |
४ क
वन पर्व
अध्याय
६३
वृहदश्व उवाच
स नागः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानो नलं तदा |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
स नागः प्रेषितस्तेन वाणो ज्याचोदितो यथा |
३७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
८८
सञ्जय़ उवाच
स नागप्रवरेणाजौ वलिना शीघ्रगामिना |
७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स नागप्रवरो भीमं सहसा समुपाद्रवत् ||
२० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७५
वैशम्पाय़न उवाच
स नागप्रवरो वीर्यादर्जुनेन निवारितः |
१३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
८
सञ्जय़ उवाच
स नागप्रवरोऽत्युग्रो विधिवत्कल्पितो वभौ |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
वैशम्पाय़न उवाच
स नागभवने रात्रिं तामुषित्वा प्रतापवान् |
३४ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२५
सञ्जय़ उवाच
स नागराजः प्रवराङ्कुशाहतः; पुरा सपक्षोऽद्रिवरो यथा नृप |
५६ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
स नागराजः सनिय़न्तृकोऽपत; त्पराहतो वभ्रुसुतेषुभिर्भृशम् |
४९ क
कर्ण पर्व
अध्याय
६२
सञ्जय़ उवाच
स नागराजः सह राजसूनुना; पपात रक्तं वहु सर्वतः क्षरन् |
४५ क