वन पर्व
अध्याय
२०
वासुदेव उवाच
स त्वं सात्वतमुख्याद्य लव्धसञ्ज्ञो यदृच्छय़ा |
५ क
आदि पर्व
अध्याय
६८
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं स्वय़मनुप्राप्तं साभिलाषमिमं सुतम् |
५३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
स त्वन्यं रथमास्थाय़ विधिवत्कल्पितं पुनः |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
सञ्जय़ उवाच
स त्वमद्य महावाहो प्रिय़ार्थं मम माधव |
२० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
स त्वमद्य महावाहो युध्यस्व मदनन्तरम् |
६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
६०
सञ्जय़ उवाच
स त्वमद्य महावाहो राजानं परिपालय़ |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
९८
सञ्जय़ उवाच
स त्वमद्य रणं त्यक्त्वा भीतो हर्षय़से परान् ||
९ ग
वन पर्व
अध्याय
२८६
सूर्य उवाच
स त्वमप्येनमाराध्य सूनृताभिः पुनः पुनः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२११
वासुदेव उवाच
स त्वमर्जुन कल्याणीं प्रसह्य भगिनीं मम |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
स त्वमर्थं संशय़ितं विना तै; राशंससे पुत्रवशानुगोऽद्य |
१६ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१४५
भीष्म उवाच
स त्वमस्मद्धितार्थं वै राजा भव महामते ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३९
वासुदेव उवाच
स त्वमातिष्ठ कल्याणं मा ते भूद्ग्लानिरच्युत |
४९ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८६
युधिष्ठिर उवाच
स त्वमातिष्ठ यानाय़ यत्र यातो धनञ्जय़ः |
४२ क
वन पर्व
अध्याय
६४
ऋतुपर्ण उवाच
स त्वमातिष्ठ योगं तं येन शीघ्रा हय़ा मम |
६ क
आदि पर्व
अध्याय
२०६
उलूप्यु उवाच
स त्वमात्मप्रदानेन सकामां कर्तुमर्हसि ||
३२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१३
वासुदेव उवाच
स त्वमिष्ट्वा महाय़ज्ञैः समृद्धैराप्तदक्षिणैः |
२१ क
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व क्षत्रधर्मेण भारत ||
३२ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व विनीय़ भय़मात्मनः |
२७ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
स त्वमेतादृशः शल्य नोत्तरं वक्तुमर्हसि ||
८१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६९
सञ्जय़ उवाच
स त्वमेवंविधं कृत्वा कर्म चाण्डालवत्स्वय़म् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६८
सञ्जय़ उवाच
स त्वमेवंविधं जानन्भ्रातरं मां नरर्षभ |
१९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५०
नारद उवाच
स त्वमेवंविधं वाय़ुं सर्वसत्त्वभृतां वरम् |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८३
पराशर उवाच
स त्वमेवंविधो दान्तः क्षत्रिय़ः प्रिय़वान्धवः |
२५ क
वन पर्व
अध्याय
२९६
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वमोघानिषून्मुक्त्वा तृष्णय़ाभिप्रपीडितः |
३१ क
वन पर्व
अध्याय
६९
वृहदश्व उवाच
स त्वर्यमाणो वहुश ऋतुपर्णेन वाहुकः |
११ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१७
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वा कुरुकुलश्रेष्ठ किञ्चिदर्थमभीप्सति |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
स त्वा गर्हे भारतानां विरोधा; दन्तो नूनं भविताय़ं प्रजानाम् |
२७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१६४
भीष्म उवाच
स त्वां त्वरति वै द्रष्टुं तत्क्षिप्रं संविधीय़ताम् ||
२४ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
अग्निरु उवाच
स त्वां दन्तान्विदशन्नभ्यधाव; ज्जिघांसय़ा शूलमुद्यम्य घोरम् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वां द्रव्यमय़ो यज्ञः सम्प्राप्तः सर्वदक्षिणः |
३४ क
कर्ण पर्व
अध्याय
३०
सञ्जय़ उवाच
स त्वां पूर्वमहं हत्वा हनिष्ये केशवार्जुनौ ||
८२ ख
वन पर्व
अध्याय
१७६
वैशम्पाय़न उवाच
स त्वां मोक्षय़िता शापादिति मामव्रवीदृषिः ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०३
भृगुरु उवाच
स त्वां मोक्षय़िता शापादित्युक्त्वान्तरधीय़त ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
स त्वां संमन्तुमिच्छामि मानार्हासि मता हि मे ||
२२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३१
भीष्म उवाच
स त्वाश्रममुपागम्य भरद्वाजस्य धीमतः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
स त्वाय़ुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम् |
४ क
आदि पर्व
अध्याय
१५८
अर्जुन उवाच
स त्विदं मह्यमददाद्द्रोणो व्राह्मणसत्तमः ||
२७ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
४६
युधिष्ठिर उवाच
स त्वय़ा पुरुषव्याघ्र कथं युद्धे निषूदितः |
२९ क
आदि पर्व
अध्याय
१०५
वैशम्पाय़न उवाच
स तय़ा कुन्तिभोजस्य दुहित्रा कुरुनन्दनः |
३ क
आदि पर्व
अध्याय
३
सूत उवाच
स तय़ा क्रुद्धय़ा तत्रोक्तः |
८ क
भीष्म पर्व
अध्याय
५०
सञ्जय़ उवाच
स तय़ा निहतो राजन्कलिङ्गस्य सुतो रथात् |
२२ क
शल्य पर्व
अध्याय
४५
वैशम्पाय़न उवाच
स तय़ा भीमय़ा देवः शूलमुद्गरहस्तय़ा |
५८ क
सभा पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स तय़ा मूर्ध्न्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः ||
३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
११७
नारद उवाच
स तय़ा रममाणोऽथ विश्वामित्रो महाद्युतिः |
१७ क
वन पर्व
अध्याय
५८
वृहदश्व उवाच
स तय़ा वाह्यतः सार्धं त्रिरात्रं नैषधोऽवसत् ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
८०
सञ्जय़ उवाच
स तय़ा वीरघातिन्या गदय़ा गदिनां वरः |
२३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
६७
सञ्जय़ उवाच
स तय़ा वीरघातिन्या जनार्दनमताडय़त् |
५१ क
द्रोण पर्व
अध्याय
८२
सञ्जय़ उवाच
स तय़ा वीरघातिन्या शक्त्या त्वभिहतो भृशम् |
१७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२९
श्रीभगवानु उवाच
स तय़ा श्रद्धय़ा युक्तस्तस्या राधनमीहते |
२२ क
आदि पर्व
अध्याय
११६
वैशम्पाय़न उवाच
स तय़ा सह सङ्गम्य भार्यया कुरुनन्दन |
१२ क