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वन पर्व
अध्याय २०९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वाहेति दारुणा क्रूरा सर्वभूतेषु तिष्ठति ||
२२ ग
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
स्वाय़म्भुवं महाभागं स पश्यति नराधिप ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २७
सिद्ध उवाच
स्वाय़म्भुवं यथा स्थानं सर्वेषां श्रेष्ठमुच्यते |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
वासुदेव उवाच
स्वाय़म्भुवः क्रतुश्चापि पुत्रार्थमभवत्पुरा |
६० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १४
उपमन्युरु उवाच
स्वाय़म्भुवाद्या मनवो भृग्वाद्या ऋषय़स्तथा |
१४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३२२
भीष्म उवाच
स्वाय़म्भुवेषु धर्मेषु शास्त्रे चोशनसा कृते |
४३ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ९१
भीष्म उवाच
स्वाय़म्भुवोऽत्रिः कौरव्य परमर्षिः प्रतापवान् |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ६४
वैशम्पाय़न उवाच
स्विद्यते च महावाहुरन्तर्दाहेन वीर्यवान् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १४७
वैशम्पाय़न उवाच
स्विन्नगात्रोऽभवद्भीमो न चोद्धर्तुं शशाक ह ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
स्विष्टकृद्भिषगावर्तः कपिलस्त्वं च वामनः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ७२
भीष्म उवाच
स्विष्टिः स्वधीतिः सुतपा लोकाञ्जय़ति यावतः |
३० क
आदि पर्व
अध्याय ९२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
भीष्म उवाच
स्वे स्थाने न च तिष्ठन्ति लङ्घय़न्ति हि तद्वचः ||
४९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६२
सञ्जय़ उवाच
स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे स्वांश्च स्वे परांश्च परान्परे ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४४
सञ्जय़ उवाच
स्वे स्वान्परे परांश्चापि निजघ्नुरितरेतरम् |
४२ क
भीष्म पर्व
अध्याय ४०
श्रीभगवानु उवाच
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वे स्वे किल कुले जाते पुत्रे नप्तरि वा पुनः |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०७
भीष्म उवाच
स्वे स्वे तीर्थे समाचम्य कार्ये समुपकल्पिते |
१०१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११९
भीष्म उवाच
स्वे स्वे स्थानेऽपरिक्रुष्टास्ते स्यू राज्ञो वहिश्चराः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४५
भीष्म उवाच
स्वेदं मूत्रं पुरीषं च तस्मिन्प्रेत उपाश्नुते ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८१
भरद्वाज उवाच
स्वेदमूत्रपुरीषाणि श्लेष्मा पित्तं सशोणितम् |
८ क
शल्य पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
स्वेदाभिभूतं रुधिरोक्षिताङ्गं; विसञ्ज्ञकल्पं च तथा विषण्णम् ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १९२
व्राह्मण उवाच
स्वेन कार्यं करिष्यामि त्वत्तो नेच्छे फलं नृप |
७९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २२
धृतराष्ट्र उवाच
स्वेन च्छन्देन नः सर्वान्नावधीद्व्यक्तमर्जुनः |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४५
व्यास उवाच
स्वेन तत्त्वेन तत्त्वज्ञाः पश्यन्ति निय़तेन्द्रिय़ाः ||
४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८६
भीष्म उवाच
स्वेन तेजोविसर्गेण वीर्येण परमेण च ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय ३३
सूत उवाच
स्वेन मूत्रपुरीषेण सर्वभोज्यविनाशिना ||
२४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ११२
नारद उवाच
स्वेन राजर्षितपसा पूर्णं त्वां पूरय़िष्यति ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९६
कण्व उवाच
स्वेन वा सूत कार्येण शासनाद्वा शतक्रतोः ||
२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेन सैन्येन संवीता यथादित्याः स्वरश्मिभिः ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६४
भीष्म उवाच
स्वेन सैन्येन सहितः प्रतपञ्शत्रुवाहिनीम् |
२० क
शान्ति पर्व
अध्याय १९४
मनुरु उवाच
स्वेनात्मना चक्षुरिव प्रणेता; निशात्यये तमसा संवृतात्मा |
१३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ६५
सञ्जय़ उवाच
स्वेनानीकेन हृष्टेन युद्धाय़ समवस्थितः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६७
सञ्जय़ उवाच
स्वेनास्त्रेण हतं दृष्ट्वा श्रुताय़ुधमरिन्दमम् ||
५४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
स्वेनैव तपसा तेषामृषित्वं विदधुः पुनः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेनैवात्मप्रभावेन द्वितीय़ इव भास्करः ||
८ ख
वन पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेभ्यश्चैव परेभ्यश्च कार्याकार्यसमुद्भवा |
४७ क
भीष्म पर्व
अध्याय १६
सञ्जय़ उवाच
स्वेषां चैव परेषां च द्युतिमन्तः सहस्रशः ||
२९ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १८
सञ्जय़ उवाच
स्वेषां चैव परेषां च समदृश्यन्त भारत |
७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४८
सञ्जय़ उवाच
स्वेषां जय़ाय़ द्विषतां वधाय़; ख्यातोऽमितौजाः कुलतन्तुकर्ता ||
१० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
स्वेषां त्राणार्थमुद्युक्तं वधाय़ द्विषतामपि |
९९ क
द्रोण पर्व
अध्याय ५०
सञ्जय़ उवाच
स्वेषां प्रिय़हिते युक्तं पितॄणां जय़गृद्धिनम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय १
सूत उवाच
स्वेषां सुतानां कर्णवुद्धौ रतानां; तदा नाशंसे विजय़ाय़ सञ्जय़ ||
११२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेषु चान्येषु वा तस्य न सहाय़ा भवन्त्युत ||
३४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १११
भीष्म उवाच
स्वेषु दारेषु वर्तन्ते न्याय़वृत्तेष्वृतावृतौ |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
स्वेषु दारेषु सन्तोषः शौचं नित्यानसूय़ता |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ६०
भीष्म उवाच
स्वेषु धर्मेष्ववस्थाप्य प्रजाः सर्वा महीपतिः |
१९ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२६
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेषु वन्धुषु कः साधुश्चरेदेवमसाम्प्रतम् ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ९३
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेषु वन्धुषु मुख्येषु तद्वेत्थ भरतर्षभ ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२२
वैशम्पाय़न उवाच
स्वेषु वन्धुषु मुख्येषु मा मन्युवशमन्वगाः ||
३१ ख