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शान्ति पर्व
अध्याय २२७
व्यास उवाच
स्वभावस्रोतसा वृत्तमुह्यते सततं जगत् ||
१२ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २०४
गुरुरु उवाच
स्वभावहेतुजा भावा यद्वदन्यदपीदृशम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
स्वभावा व्यतिवर्तन्ते ये निय़ुक्ताः शरीरिषु ||
३६ ख
वन पर्व
अध्याय २६४
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वभावाच्छीलदोषेण सर्वेषां भय़वर्धनः ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २०६
गुरुरु उवाच
स्वभावात्कर्मय़ोगाद्वा तानुपेक्षेत वुद्धिमान् ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १८८
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वभावात्क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशङ्किनः |
५५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ७२
भीमसेन उवाच
स्वभावात्पापमन्वेति तृणैस्तुन्न इवोरगः ||
७ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय २३
व्राह्मण्यु उवाच
स्वभावात्सप्त होतार इति ते पूर्विका मतिः |
३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
स्वभावात्सम्प्रवर्तन्ते निवर्तन्ते तथैव च |
१५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
प्रह्राद उवाच
स्वभावादेव तत्सर्वं यत्किञ्चिदनुपश्यसि ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
भीष्म उवाच
स्वभावादेव तत्सर्वमिति मे निश्चिता मतिः |
२३ क
शान्ति पर्व
अध्याय १७२
भीष्म उवाच
स्वभावादेव सन्दृश्य वर्तमानाः प्रवृत्तय़ः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१८
नारद उवाच
स्वभावाद्यत्नमातिष्ठेद्यत्नवान्नावसीदति |
२ क
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
स्वभावाद्या च मे प्रीतिः सहदेवे जनार्दन |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१२
भीष्म उवाच
स्वभावाद्वर्तमानेषु सर्वभूतेषु हेतुतः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २१५
प्रह्राद उवाच
स्वभावाल्लभते प्रज्ञां शान्तिमेति स्वभावतः |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २३०
व्यास उवाच
स्वभावेन प्रवर्तन्ते द्वन्द्वसृष्टानि भूरिशः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२४
भीष्म उवाच
स्वभावेनैव वर्तन्ते द्वन्द्वय़ुक्तानि भूरिशः ||
७२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २२९
व्यास उवाच
स्वभावो हि विनाशाय़ मोहकर्ममनोभवः |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २४१
व्यास उवाच
स्वभावय़ुक्तं तत्सर्वं यदिमान्सृजते गुणान् |
२ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १२
धृतराष्ट्र उवाच
स्वभूमौ योजय़ेद्युद्धं परभूमौ तथैव च ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
सञ्जय़ उवाच
स्वमंशं कल्पय़ामास श्यालं ते सुवलात्मजम् ||
२२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमंशं पाण्डुपुत्रेभ्यः प्रदाय़ भरतर्षभ ||
४५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९१
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमंशं भगवान्व्यासः कुन्त्यै पादाभिवादनात् |
२७ क
शल्य पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
स्वमंशमवशिष्टं स संस्मृत्य शकुनिं नृप |
४४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमतं पुरुषव्याघ्र को नः सेनापतिः क्षमः ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
स्वमनीकं महावाहुः पार्षतं समुपाद्रवत् ||
३९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६
सञ्जय़ उवाच
स्वमनीकमवस्थाप्य वाहुवीर्ये व्यवस्थितः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय ३३
विदुर उवाच
स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय १४
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमर्थमभिसन्धाय़ तस्यार्थमनुचिन्त्य च |
४ क
आदि पर्व
अध्याय २१८
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमस्त्रमसृजद्दीप्तं यत्ततानाखिलं नभः ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धय़ितुमिच्छति |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धय़ितुमिच्छति |
३४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
स्वमांसं परमांसैर्यो विवर्धय़ितुमिच्छति |
१० क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११५
भीष्म उवाच
स्वमांसैः परमांसानि परिपाल्य दिवं गताः ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४१
युधिष्ठिर उवाच
स्वमांसैर्भोजितः कां च गतिं लेभे स भारत ||
५ ख
वन पर्व
अध्याय १८१
मार्कण्डेय़ उवाच
स्वमात्मानं परं चैव वुध्यन्ते ज्ञानचक्षुषः |
३१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ४९
सिद्धा ऊचुः
स्वमाश्रमपदं पुण्यमाजगाम पतङ्गवत् |
५० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भृगुरु उवाच
स्वमाश्रमपदं प्राय़ात्पूज्यमानो द्विजातिभिः ||
२८ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५७
कर्ण उवाच
स्वमाय़ुधं चोपविकीर्य भूतले; धनुश्च कृत्वा सगुणं गुणाधिकः |
६१ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
स्वमेव कर्म रक्ष्यतां स्वकर्म तत्र गच्छति ||
५६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ३५
भीष्म उवाच
स्वमेव कुर्वतां कर्म श्रीर्वो व्राह्मी भविष्यति |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
स्वमेव चार्थं कुर्वाणा यज्ञं चक्रुः पुनर्द्विजाः |
२६ क
शल्य पर्व
अध्याय ४०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमेव नगरं राजा प्रतिपेदे महर्द्धिमत् ||
२५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३४६
भीष्म उवाच
स्वमेव भवनं जग्मुरकृतार्था नरर्षभ ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय २८१
यम उवाच
स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यतेऽचिरा; न्न च स्वधर्मात्परिहास्यते नृपः |
३२ क
स्त्री पर्व
अध्याय १०
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमेव राष्ट्रं हार्दिक्यो द्रौणिर्व्यासाश्रमं यय़ौ ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ७३
वाय़ुरु उवाच
स्वमेव व्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च |
११ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४५
वैशम्पाय़न उवाच
स्वमेवावसथं शौरिर्विश्रामार्थं जगाम ह ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
स्वरक्षणे कृतमतय़स्तदा जना; स्त्यजन्ति वाहानपि पार्थपीडिताः ||
४१ ख