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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७१
वैशम्पाय़न उवाच
स्फ्यश्च कूर्चश्च सौवर्णो यच्चान्यदपि कौरव |
१० क
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
स्मर तद्दुष्कृतं कर्म यद्वृत्तं वारणावते ||
३७ ख
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
स्मर तद्दुष्कृतं कर्म यद्वृत्तं वारणावते ||
२८ ख
आदि पर्व
अध्याय ३
सूत उवाच
स्मर तावत् |
११२ ग
वन पर्व
अध्याय ४८
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरणीय़ाः स्मरिष्यामि मय़ा या न कृताः पुरा ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३५२
व्राह्मण उवाच
स्मरणीय़ोऽस्मि भवता सम्प्रेषणनिय़ोजनैः ||
२ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ११
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरतः पुत्रपौत्राणां भ्रातॄणां स्वजनस्य ह ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १७०
व्राह्मण्यु उवाच
स्मरता निहतान्वन्धूनादत्तानि न संशय़ः ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
स्मरतां तव वाक्यानि शमं प्रति जनेश्वरः ||
१२ ख
सभा पर्व
अध्याय ६६
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरन्तं त्वामाजमीढ स्मारय़िष्याम्यहं पुनः |
३३ क
उद्योग पर्व
अध्याय २४
सञ्जय़ उवाच
स्मरन्ति तुभ्यं नरदेव सङ्गमे; युद्धे च जिष्णोश्च युधां प्रणेतुः |
५ क
आदि पर्व
अध्याय १४३
भीम उवाच
स्मरन्ति वैरं रक्षांसि माय़ामाश्रित्य मोहिनीम् |
१ क
सभा पर्व
अध्याय ६४
अर्जुन उवाच
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतानि च |
९ क
सभा पर्व
अध्याय ६५
धृतराष्ट्र उवाच
स्मरन्ति सुकृतान्येव न वैराणि कृतान्यपि |
९ क
वन पर्व
अध्याय ६४
वृहदश्व उवाच
स्मरन्ती तस्य मन्दस्य कं वा साद्योपतिष्ठति ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय ७९
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरन्ती पाण्डवश्रेष्ठमिदं वचनमव्रवीत् ||
११ ख
सभा पर्व
अध्याय १३
श्रीकृष्ण उवाच
स्मरन्तो मध्यमं देशं वृष्णिमध्ये गतव्यथाः ||
५९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरन्तो मातरं वीरा वभूवुर्भृशदुःखिताः ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ६
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरन्नुद्विग्नहृदय़ो वभूवास्वस्थचेतनः ||
११ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५४
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरन्नेव च तं प्राह मातङ्गः प्रहसन्निव |
१७ क
शान्ति पर्व
अध्याय १२६
भीष्म उवाच
स्मरन्पुत्रमरण्ये वै नष्टं परमदुर्मनाः |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०९
भीष्म उवाच
स्मरन्पुरा न तप्यसे निधत्स्व केवलं निधिम् ||
३९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८३
सञ्जय़ उवाच
स्मरन्भ्रातृवधं चैव पाण्डवेन महात्मना ||
२१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
धृतराष्ट्र उवाच
स्मरमाणः कथं भीमो युय़ुधे सूतसूनुना ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २१
कर्ण उवाच
स्मरमाणा न हास्यन्ति सङ्ग्राममिति मे मतिः ||
२० ख
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
स्मरसि ननु यदा परैर्हृतः; स च धृतराष्ट्रसुतो विमोक्षितः |
६६ क
कर्ण पर्व
अध्याय २६
सञ्जय़ उवाच
स्मरसि ननु यदा प्रमोचिताः; खचरगणानवजित्य पाण्डवैः ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
स्मरामि तानि सर्वाणि वाल्ये वृत्तानि यानि नौ |
२५ क
स्त्री पर्व
अध्याय १३
वैशम्पाय़न उवाच
स्मरामि भाषमाणाय़ास्तथा प्रणिहिता ह्यसि ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६०
भीष्म उवाच
स्मरामि शिथिलं सत्यं वेदा इत्यव्रवीत्सकृत् ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १७७
राम उवाच
स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम |
१७ क
शल्य पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत्तच्छकुनिवुद्धिजम् ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३२
सञ्जय़ उवाच
स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत्तच्छकुनिवुद्धिजम् ||
३३ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८८
भीष्म उवाच
स्मरिष्यसि च तत्सर्वं देहमन्यं गता सती ||
१२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५१
युधिष्ठिर उवाच
स्मरेथाश्चापि मां नित्यं भीमं च वलिनां वरम् |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ९०
युधिष्ठिर उवाच
स्मरेद्धि देवराजो यं किं नामाभ्यधिकं ततः ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ८०
वैशम्पाय़न उवाच
स्मर्तव्यः सर्वकालेषु परेषां सन्धिमिच्छता ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३१
नारद उवाच
स्मर्तव्योऽहं महाराज दर्शय़िष्यामि ते स्मृतः ||
२० ख
शान्ति पर्व
अध्याय १६
वैशम्पाय़न उवाच
स्मर्तुमर्हसि कौरव्य दिष्टं तु वलवत्तरम् |
१६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय १२
वासुदेव उवाच
स्मर्तुमिच्छसि कौन्तेय़ दिष्टं हि वलवत्तरम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २२८
शकुनिरु उवाच
स्मारणं च चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम् ||
२० ख
वन पर्व
अध्याय २२८
वैशम्पाय़न उवाच
स्मारणासमय़ः प्राप्तो वत्सानामपि चाङ्कनम् ||
४ ख
वन पर्व
अध्याय १७६
वैशम्पाय़न उवाच
स्मार्तमस्ति पुराणं मे यथैवाधिगतं तथा ||
२० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ४३
देवशर्मो उवाच
स्मारय़न्तस्तथा प्राहुस्ते यथा श्रुतवान्भवान् ||
८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०३
सञ्जय़ उवाच
स्मितं कृत्वा महावाहुर्धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ||
३१ ख
विराट पर्व
अध्याय ४
धौम्य उवाच
स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शय़ेत प्रसादजम् ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४६
सञ्जय़ उवाच
स्मितपूर्वममित्रघ्नः पूजय़न्भरतर्षभ ||
२ ख
आदि पर्व
अध्याय १३९
वैशम्पाय़न उवाच
स्मितपूर्वमिदं वाक्यं भीमसेनमथाव्रवीत् ||
१८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय १३४
उमो उवाच
स्मितपूर्वमिवाभाष्य सर्वास्ताः सरितस्तदा ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान्वासवानुजः ||
१० ख