वन पर्व
अध्याय
१५५
वैशम्पाय़न उवाच
स्निग्धपत्रफला वृक्षा गन्धमादनसानुषु ||
६५ ग
वन पर्व
अध्याय
१४६
वैशम्पाय़न उवाच
स्निग्धपत्रैरविरलैः शीतच्छाय़ैर्मनोरमैः ||
३ ख
विराट पर्व
अध्याय
५३
अर्जुन उवाच
स्निग्धविद्रुमसङ्काशास्ताम्रास्याः प्रिय़दर्शनाः |
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५७
सञ्जय़ उवाच
स्निग्धाञ्जनचय़ाकारं सम्प्राप्तः कालपर्वतम् |
२७ क
वन पर्व
अध्याय
१४५
वैशम्पाय़न उवाच
स्निग्धामविरलच्छाय़ां श्रिय़ा परमय़ा युताम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८६
पराशर उवाच
स्निग्धैश्च क्रिय़माणानि कर्माणीह निवर्तय़ेत् |
९ क
वन पर्व
अध्याय
१४९
वैशम्पाय़न उवाच
स्निग्धैश्च नीतिविन्यासान्मूर्खान्सर्वत्र वर्जय़ेत् ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
९६
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषा इव स धर्मात्मा भगिन्य इव चानुजाः |
४४ क
वन पर्व
अध्याय
१३
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषा भवामि धर्मेण साहं दासीकृता वलात् ||
५७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८०
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषा भवामि धर्मेण साहं दासीकृताभवम् ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
प्रतीप उवाच
स्नुषा मे भव कल्याणि पुत्रार्थे त्वां वृणोम्यहम् |
११ क
द्रोण पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
स्नुषा श्वश्व्रानघाय़स्ते विशोके कुरु माधव |
१० क
विराट पर्व
अध्याय
६७
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषां तां प्रतिजग्राह कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ||
३३ ख
सभा पर्व
अध्याय
६२
द्रौपद्यु उवाच
स्नुषां दुहितरं चैव क्लिश्यमानामनर्हतीम् ||
७ ख
वन पर्व
अध्याय
२७९
अश्वपतिरु उवाच
स्नुषां प्रतीच्छ मे कन्यां भार्यां सत्यवतः सुताम् ||
१२ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३८
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषां विचित्रवीर्यस्य भार्यां पाण्डोर्महात्मनः |
१७ क
स्त्री पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषाणां धृतराष्ट्रस्य पश्य वृन्दान्यनेकशः ||
५७ ख
आदि पर्व
अध्याय
९२
प्रतीप उवाच
स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता ||
११ ख
शल्य पर्व
अध्याय
६३
सञ्जय़ उवाच
स्नुषाभिः प्रस्नुषाभिश्च वृद्धो राजा पिता मम |
३६ क
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषाभिः संवृतां शश्वत्ताराभिरिव रोहिणीम् ||
२७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषाभिर्भरतश्रेष्ठ गान्धार्या विदुरेण च ||
२२ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
अर्जुन उवाच
स्नुषार्थमुत्तरां राजन्प्रतिगृह्णामि ते सुताम् ||
७ ख
शल्य पर्व
अध्याय
५८
सञ्जय़ उवाच
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य विह्वलाः |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
१३९
कर्ण उवाच
स्नुषाश्च प्रस्नुषाश्चैव धृतराष्ट्रस्य सङ्गताः |
५० क
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
स्नुषाश्च विधवाः सर्वा दिष्ट्या नाद्येह पश्यसि ||
९ ख
सभा पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
स्नुषास्ता धृतराष्ट्रस्य नातिप्रमनसोऽभवन् ||
३२ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
२४
गान्धार्यु उवाच
स्नुषास्ते परिधावन्ति हतापत्या हतेश्वराः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय
६७
अर्जुन उवाच
स्नुषाय़ा दुहितुर्वापि पुत्रे चात्मनि वा पुनः |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२१९
स्कन्द उवाच
स्नुषय़ा पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
स्नेहं हि करुणं दृष्ट्वा ममाप्यश्रूण्यथागमन् ||
४५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
स्नेहजानिह ते पाशान्वक्ष्यामि शृणु तान्मम |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१६
नारद उवाच
स्नेहजालसमाकृष्टान्पश्य जन्तून्सुदुःखितान् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
स्नेहनोऽस्नेहनश्चैव अजितश्च महामुनिः |
८७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
भीष्म उवाच
स्नेहपङ्कं जरादुर्गं स्पर्शद्वीपमरिन्दम ||
६२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
स्नेहपाशसितो मूढो न स मोक्षाय़ कल्पते ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८७
पराशर उवाच
स्नेहपाशैर्वहुविधैरासक्तमनसो नराः |
३३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय़ निश्चलम् |
३२ क
आदि पर्व
अध्याय
१४४
व्यास उवाच
स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं वस्तन्निवोधत ||
१० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
स्नेहमुत्सृज्य गच्छन्ति वाष्पपूर्णाविलेक्षणाः ||
३८ ख
आदि पर्व
अध्याय
२२१
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहमूलानि दुःखानि स्नेहजानि भय़ानि च |
२७ क
सभा पर्व
अध्याय
१३
श्रीकृष्ण उवाच
स्नेहवद्धस्तु पितृवन्मनसा भक्तिमांस्त्वय़ि |
१५ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहवाष्पाकुले नेत्रे प्रमृज्य रुदतीं वचः ||
२७ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
८
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहश्च पाण्डुपुत्रेषु ज्ञात्वा दैवकृतं विधिम् ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय
१३९
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहस्रवान्प्रस्रवति जिह्वा पर्येति मे मुखम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०
राजो उवाच
स्नेहाच्च वहुमानाच्च नास्त्यदेय़ं हि मे तव ||
४१ ख
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहात्करणरागश्च प्रजज्ञे वैषय़स्तथा |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहात्तु सज्जते जन्तुर्दुःखय़ोगमुपैति च ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
८३
मुनिरु उवाच
स्नेहात्त्वां प्रव्रवीम्येतन्मा भूय़ो विभ्रमेदिति ||
६३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९८
वैशम्पाय़न उवाच
स्नेहात्परिष्वज्य स तान्पप्रच्छानामय़ं ततः ||
१० ख