शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
स्थानमानं वय़ोमानं कुलमानं तथैव च |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२९०
युधिष्ठिर उवाच
स्थानमुत्तममासाद्य भगवन्तं स्थिरव्रताः |
७६ क
वन पर्व
अध्याय
१६०
वैशम्पाय़न उवाच
स्थानमेतन्महाभाग ध्रुवमक्षय़मव्ययम् |
२३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३८
विदुर उवाच
स्थानवृद्धिक्षय़ज्ञस्य षाड्गुण्यविदितात्मनः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३२
नरनाराय़णावू ऊचतुः
स्थानस्य सा भवेत्तस्य स्वय़ं तेन विराजता ||
५ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१६
व्राह्मण उवाच
स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलव्धात्पुनः पुनः ||
२९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१९
नमुचिरु उवाच
स्थानाच्च्युतश्चेन्न मुमोह गौतम; स्तावत्कृच्छ्रामापदं प्राप्य वृद्धः ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
१४०
लोमश उवाच
स्थानात्प्रच्यावय़ेय़ुर्ये देवराजमपि ध्रुवम् ||
७ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
८३
वसिष्ठ उवाच
स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च |
५६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०४
भीष्म उवाच
स्थानानि शङ्कितानां च नित्यमेव विवर्जय़ेत् |
३० क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१७
सिद्ध उवाच
स्थानान्येतानि जानीहि नराणां पुण्यकर्मणाम् ||
३६ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
८९
भीष्म उवाच
स्थानान्येतानि सङ्गम्य प्रसङ्गे भूतिनाशनः |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
स्थानासनाभ्यां विचरन्व्रती सं; स्त्रिभिर्वर्षैः शमय़ेदात्मपापम् ||
२७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५९
भीष्म उवाच
स्थानासनाभ्यां विहरेत्त्रिरह्नोऽभ्युदितादपः |
५६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२३६
व्यास उवाच
स्थानासनैर्वर्तय़न्ति सवनेष्वभिषिञ्चते ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३७
विदुर उवाच
स्थाने कुमारीः प्रतिपाद्य सर्वा; अरण्यसंस्थो मुनिवद्वुभूषेत् ||
३५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
विश्वामित्र उवाच
स्थाने तावत्संशय़ः प्रेत्यभावे; निःसंशय़ं कर्मणां वा विनाशः |
७५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
स्थाने मतङ्गो व्राह्मण्यं नालभद्भरतर्षभ |
१९ क
आदि पर्व
अध्याय
१७१
और्व उवाच
स्थाने रोषः प्रय़ुक्तः स्यान्नृपैः स्वर्गजिगीषुभिः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
९७
सञ्जय़ उवाच
स्थाने वा गमने वापि दूरं यातश्च सात्यकिः ||
५२ ख
विराट पर्व
अध्याय
४२
वैशम्पाय़न उवाच
स्थाने वापि व्रजन्तो वा सदा हेषन्ति वाजिनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५३
भीष्म उवाच
स्थाने स्थानं क्षय़े क्षैण्यमुपैति विविधां गतिम् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३३
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या; जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |
३६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१०
गुरुरु उवाच
स्थानेभ्यो ध्वंसमानाश्च सूक्ष्मत्वात्तानुपासते ||
२३ ग
शान्ति पर्व
अध्याय
२८९
भीष्म उवाच
स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः |
४० क
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय
३
वैशम्पाय़न उवाच
स्थानेऽस्मिन्वस राजेन्द्र कर्मभिर्निर्जिते शुभैः |
३१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
स्थापनं चाकरोद्विष्णुः स्वय़मेव सनातनः |
१२९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७३
व्रह्महत्यो उवाच
स्थापना वै सुमहती त्वय़ा देव प्रवर्तिता ||
२४ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
स्थापनाक्षेपसिद्धान्तपरमार्थज्ञतां गतैः |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५९
भीष्म उवाच
स्थापनामथ देवानां न कश्चिदतिवर्तते |
१३७ क
सभा पर्व
अध्याय
४५
दुर्योधन उवाच
स्थापिता तत्र सञ्ज्ञाभूच्छङ्खो ध्माय़ति नित्यशः ||
३० ख
आदि पर्व
अध्याय
११३
वैशम्पाय़न उवाच
स्थापिता येन यस्माच्च तन्मे विस्तरतः शृणु ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३
युधिष्ठिर उवाच
स्थापितो नरलोकेऽस्मिन्विद्वान्व्राह्मणसंस्तुतः ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१८
शक्र उवाच
स्थापितो ह्यस्य समय़ः पूर्वमेव स्वय़म्भुवा |
३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय
११२
भीष्म उवाच
स्थापितोऽय़ं पुत्र त्वय़ा सामन्तेष्वधि विश्रुतः |
६५ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्थापय़न्विप्रशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ||
४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
स्थापय़स्वाद्य पाञ्चाल्य तस्य गोप्ताहमप्युत ||
२५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४१
वैशम्पाय़न उवाच
स्थापय़ामास तत्तीर्थं स्थाणुतीर्थमिति प्रभो ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
स्थापय़ामास वै पृथ्व्यां कुशानास्तीर्य नारद ||
१३ ग
आदि पर्व
अध्याय
९५
वैशम्पाय़न उवाच
स्थापय़ामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः ||
५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५६
सञ्जय़ उवाच
स्थापय़ित्वा ततो द्वाःस्थान्गोप्तॄंश्चात्ताय़ुधान्नरान् |
६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३३
नरनाराय़णावू ऊचतुः
स्थापय़ित्वा तु धरणीं स्वे स्थाने पुरुषोत्तमः |
१२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
स्थापय़ित्वा प्रजापालं पुत्रं राज्ये च पाण्डव |
१९ क
वन पर्व
अध्याय
१८९
मार्कण्डेय़ उवाच
स्थापय़ित्वा स मर्यादाः स्वय़म्भुविहिताः शुभाः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३३५
व्यास उवाच
स्थापय़ित्वा हय़शिर उदक्पूर्वे महोदधौ |
५४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
८५
अग्निरु उवाच
स्थापय़िष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
स्थापय़ेत्सर्वकार्येषु राजा धर्मार्थरक्षिणः ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३१
भीष्म उवाच
स्थापय़ेदेव मर्यादां जनचित्तप्रसादिनीम् |
१२ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५७
सञ्जय़ उवाच
स्थापय़ेद्युधि वार्ष्णेय़स्तस्मात्कृष्णो निपात्यताम् ||
२१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२२
वसुहोम उवाच
स्थावरं जङ्गमं चैव क्षत्रिय़ेभ्यः सनातनम् ||
४९ ग