chevron_left  सूतपुत्रेarrow_drop_down
द्रोण पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रे हते पापे धार्तराष्ट्रे च संय़ुगे ||
६४ ग
वन पर्व
अध्याय ४१
अर्जुन उवाच
सूतपुत्रेण च रणे नित्यं कटुकभाषिणा ||
११ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रेण नागेषु रथेषु च हय़ेषु च |
५७ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४३
कुन्त्यु उवाच
सूतपुत्रेति मा शव्दः पार्थस्त्वमसि वीर्यवान् ||
१२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५६
वासुदेव उवाच
सूतपुत्रो जरासन्धश्चेदिराजो निषादजः |
५ क
उद्योग पर्व
अध्याय १२७
वैशम्पाय़न उवाच
सूतपुत्रो दृढक्रोधो भ्राता दुःशासनश्च ते ||
४७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ११०
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रो महाराज भीमसेनमवैक्षत ||
३८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रो महाराज सात्यकिं प्रत्ययोधय़त् ||
३४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रो रणे क्रुद्धः पाण्डवानामनीकिनीम् |
७७ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४०
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रोऽपि समरे पाञ्चालान्केकय़ांस्तथा |
४ क
वन पर्व
अध्याय २४१
वैशम्पाय़न उवाच
सूतपुत्रोऽपय़ाद्भीतो गन्धर्वाणां तदा रणात् |
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १४५
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रोऽव्रवीद्राजन्दुर्योधनमिदं वचः ||
४५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १०६
सञ्जय़ उवाच
सूतपुत्रोऽस्त्रमाय़ाभिरग्रसत्सुमहाय़शाः ||
२४ ख
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
सूतमन्यमुपादाय़ यय़ौ स्वपुरमेव हि ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
सूतमश्वांश्च चतुरो निहत्याभ्यद्रवद्रणे ||
४६ ग
द्रोण पर्व
अध्याय ६१
धृतराष्ट्र उवाच
सूतमागधसङ्घानां नर्तकानां च सर्वशः ||
७ ख
आदि पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
सूतमागधसङ्घाश्च अस्तुवंस्तत्र सुस्वनाः ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६९
वैशम्पाय़न उवाच
सूतमागधसङ्घाश्चाप्यस्तुवन्वै जनार्दनम् |
७ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
युधिष्ठिर उवाच
सूतमागधसङ्घैश्च शय़ानो यः प्रवोध्यते |
५ क
वन पर्व
अध्याय ५७
वृहदश्व उवाच
सूतमानय़ कल्याणि महत्कार्यमुपस्थितम् ||
९ ख
वन पर्व
अध्याय ६९
वृहदश्व उवाच
सूतमारोप्य वार्ष्णेय़ं जवमास्थाय़ वै परम् ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
सूतमेकेन विव्याध दशभिश्चार्जुनात्मजम् ||
९ ख
कर्ण पर्व
अध्याय १५
सञ्जय़ उवाच
सूतमेकेषुणा हत्वा महाजलदनिस्वनम् |
३३ क
वन पर्व
अध्याय ६८
वृहदश्व उवाच
सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो ह्रस्ववाहुकः |
६ क
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
सूतस्त्वधिरथः पुत्रं विवृद्धं समय़े ततः |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २५५
वैशम्पाय़न उवाच
सूतस्य नुदतो वाहान्क्षुरेणापाहरच्छिरः ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
भीम उवाच
सूताद्येमं पश्य भीमप्रमुक्तैः; सम्भिन्दद्भिः पार्थिवानाशुवेगैः |
१७ क
आदि पर्व
अध्याय २१२
वैशम्पाय़न उवाच
सूतानुच्चुक्रुशुः केच्चिद्रथान्योजय़तेति च |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय ५४
सञ्जय़ उवाच
सूताभिजानीहि परान्स्वकान्वा; रथान्ध्वजांश्चापततः समेतान् |
१० ख
वन पर्व
अध्याय २११
मार्कण्डेय़ उवाच
सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
सूतिर्विभूतिः सूतश्च सुरङ्गश्च तथैव हि ||
५६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०६
सुपर्ण उवाच
सूतिश्चैव प्रतिष्ठा च निधनं च प्रकाशते ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सूतेन चैव मत्स्यस्य कीचकेन पुनः पुनः ||
२ ख
विराट पर्व
अध्याय २४
वैशम्पाय़न उवाच
सूतेन राज्ञो मत्स्यस्य कीचकेन महात्मना ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १७१
सञ्जय़ उवाच
सूतेनापहृतस्तूर्णं द्रोणपुत्राद्रथान्तरम् ||
५२ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
सूतैः पौरोगवैश्चैव काम्यकं प्रय़युर्वनम् ||
१८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १८०
भीष्म उवाच
सूतो मे मातरिश्वा वै कवचं वेदमातरः |
४ क
उद्योग पर्व
अध्याय १३९
कर्ण उवाच
सूतो हि मामधिरथो दृष्ट्वैव अनय़द्गृहान् |
५ क
आदि पर्व
अध्याय ९६
वैशम्पाय़न उवाच
सूतोपकॢप्तान्रुचिरान्सदश्वोद्यतधूर्गतान् |
१८ क
कर्ण पर्व
अध्याय २९
सञ्जय़ उवाच
सूतोपधावाप्तमिदं त्वय़ास्त्रं; न कर्मकाले प्रतिभास्यति त्वाम् ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय २९३
वैशम्पाय़न उवाच
सूतोऽधिरथ इत्येव सदारो जाह्नवीं यय़ौ ||
१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १०२
नारद उवाच
सूतोऽय़ं मातलिर्नाम शक्रस्य दय़ितः सुहृत् |
१ क
शान्ति पर्व
अध्याय १९६
मनुरु उवाच
सूत्रजालैर्यथा मत्स्यान्वध्नन्ति जलजीविनः ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९२
वसिष्ठ उवाच
सूत्रतन्तुगुणैर्नित्यं तथाय़मगुणो गुणैः ||
४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १५८
सञ्जय़ उवाच
सूदकर्मणि च श्रान्तं विराटस्य महानसे |
३२ क
विराट पर्व
अध्याय ४
युधिष्ठिर उवाच
सूदपौरोगवैः सार्धं द्रुपदस्य निवेशने ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
वैशम्पाय़न उवाच
सूदांश्च परिवर्हं च द्रौपद्याः सर्वशो नृप ||
२८ ख
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
सूदाः पौरोगवाश्चैव मन्यते यत्र नो भवान् ||
१० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सूदाः पौरोगवाश्चैव सर्वं चैव महानसम् |
२३ क
द्रोण पर्व
अध्याय ११४
सञ्जय़ उवाच
सूदान्भृत्यजनान्दासांस्त्वं गृहे त्वरय़न्भृशम् |
७५ क