शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
सुवाक्यश्चाप्यनीर्ष्यश्च तस्मात्सर्वत्र पूजितः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
सुवाग्वहुमतो लोके प्राज्ञश्चरसि वालवत् ||
४ ख
आदि पर्व
अध्याय
१६५
गन्धर्व उवाच
सुवालधिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम् |
१४ क
उद्योग पर्व
अध्याय
९३
वैशम्पाय़न उवाच
सुवाससः स्रग्विणश्च सत्कृत्य भरतर्षभ |
३६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
सुवाससे नमो नित्यं सुव्रताय़ सुधन्विने ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय
२२६
वैशम्पाय़न उवाच
सुवाससो हि ते भार्या वल्कलाजिनवाससम् |
२० क
विराट पर्व
अध्याय
२१
वैशम्पाय़न उवाच
सुवासा दर्शनीय़श्च नान्योऽस्ति त्वादृशः पुमान् ||
४५ ख
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
सुवास्तुरिति विख्यातः स जज्ञे मनुजर्षभः ||
२४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सुवाहुर्भ्रातरं शूरं यत्तो द्रोणादवारय़त् ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय
१४१
वैशम्पाय़न उवाच
सुवाहुश्चापि तान्दृष्ट्वा पूजय़ा प्रत्यगृह्णत |
२६ क
द्रोण पर्व
अध्याय
२४
सञ्जय़ उवाच
सुवाहोः सधनुर्वाणावस्यतः परिघोपमौ |
१४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
सुविचिन्त्याव्रवीद्धीरः प्रीतस्त्वरित एव हि ||
७५ ख
सभा पर्व
अध्याय
५७
दुर्योधन उवाच
सुविज्ञेय़ः पुरुषोऽन्यत्रकामो; निन्दाप्रशंसे हि तथा युनक्ति |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३१२
भीष्म उवाच
सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् ||
३३ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९९
वैशम्पाय़न उवाच
सुविभक्तमहारथ्यं देवतावाधवर्जितम् |
३४ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुविभक्तशरीराश्च दीप्तिमन्तः स्वलङ्कृताः |
९६ क
आदि पर्व
अध्याय
१६०
गन्धर्व उवाच
सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसिताय़तलोचना |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१११
भीष्म उवाच
सुविशुद्धेन मनसा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ||
१९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
११७
भीष्म उवाच
सुविषाणो महाकाय़ो मेघगम्भीरनिस्वनः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१०१
भीष्म उवाच
सुविस्रम्भान्कृतारम्भानुपन्यासप्रतापितान् |
२५ ख
वन पर्व
अध्याय
२२
वासुदेव उवाच
सुविह्वलो महाराज पुनः शाल्वमय़ोधय़म् ||
२१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सुवीरकं याच्यमाना मद्रका कषति स्फिजौ |
८७ क
आदि पर्व
अध्याय
६१
वैशम्पाय़न उवाच
सुवीरश्च सुवाहुश्च महावीरोऽथ वाह्लिकः ||
५५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२
भीष्म उवाच
सुवीरस्य तु पुत्रोऽभूत्सर्वसङ्ग्रामदुर्जय़ः |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्मात्मवान्वुधः |
१२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१५४
भीष्म उवाच
सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्मात्मविद्वुधः |
२३ क
कर्ण पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
सुवृत्तानाय़तान्पुष्टांश्चन्दनागुरुभूषितान् |
५ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
मार्कण्डेय़ उवाच
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि |
१३ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
सुवृत्तास्तारय़न्तीह दुर्वृत्ता मज्जय़न्ति च ||
२३ ख
आदि पर्व
अध्याय
११०
पाण्डुरु उवाच
सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम् |
६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
सुवृत्तो भव राजेन्द्र पाण्डवान्प्रति मानद |
२४ क
शल्य पर्व
अध्याय
५
सञ्जय़ उवाच
सुवृत्तोरुकटीजङ्घं सुपादं स्वङ्गुलीनखम् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
१८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सुवेणां कृष्णवेणां च इरामां च महानदीम् |
९५ ख
शल्य पर्व
अध्याय
३७
वैशम्पाय़न उवाच
सुवेणुरृषभद्वीपे पुण्ये राजर्षिसेविते |
२४ क
आदि पर्व
अध्याय
६७
दुःषन्त उवाच
सुव्यक्तं राजपुत्री त्वं यथा कल्याणि भाषसे |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२५३
वैशम्पाय़न उवाच
सुव्यक्तमस्मानवमन्य पापैः; कृतोऽभिमर्दः कुरुभिः प्रसह्य ||
८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
२९
सञ्जय़ उवाच
सुव्यक्तमिति नः ख्यातो ह्रदे दुर्योधनो नृपः ||
३० ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३९
विदुर उवाच
सुव्याहृतानि धीराणां फलतः प्रविचिन्त्य यः |
३१ क
उद्योग पर्व
अध्याय
३४
विदुर उवाच
सुव्याहृतानि सुधिय़ां सुकृतानि ततस्ततः |
३१ क
शल्य पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुव्रतं सत्यसन्धं च ददौ मित्रो महात्मने |
३७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् |
६२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
३२
नारद उवाच
सुव्रता मुनय़ो ये च व्रह्मण्याः सत्यसङ्गराः |
१६ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां याम्यलोके महीय़ते ||
१३ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां वसूनां लोकमश्नुते ||
१९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां व्रह्मलोके महीय़ते ||
८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सूर्यलोके महीय़ते ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सोमलोके महीय़ते ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामग्निलोके महीय़ते ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७८
वसिष्ठ उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामिन्द्रलोके महीय़ते ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
७७
भीष्म उवाच
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामुभौ लोकौ जय़न्ति ते ||
१२ ख