शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते |
१ क
वन पर्व
अध्याय
२००
मार्कण्डेय़ उवाच
सुखदुःखविपर्यासो यदा समुपपद्यते |
७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२०६
गुरुरु उवाच
सुखदुःखसमारम्भाज्जन्माजन्मकृतक्षणाः ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११२
वृहस्पतिरु उवाच
सुखदुःखसमाय़ुक्ता व्याधितास्ते भवन्त्युत ||
१०७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१३४
मातो उवाच
सुखदुःखसहा वीर शतार्हा अनिवर्तिनः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१७०
युधिष्ठिर उवाच
सुखदुःखागमस्तेषां कः कथं वा पितामह ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३१८
नारद उवाच
सुखदुःखानि भूतानामजरो जरय़न्नसौ |
७ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
४५
व्रह्मो उवाच
सुखदुःखान्तसङ्क्लेशं क्षुत्पिपासावकीलनम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
जम्वुक उवाच
सुखदुःखान्विते लोके नेहास्त्येकमनन्तकम् ||
८४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३०८
भीष्म उवाच
सुखदुःखे जरामृत्यू लाभालाभौ प्रिय़ाप्रिय़े |
१०८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७३
भीष्म उवाच
सुखदुःखे तथा चोभे तत्र का परिदेवना ||
२६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सुखदुःखे तथा मृत्युं स्वय़मेवाधिगच्छति ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२७०
वृत्र उवाच
सुखदुःखे प्रिय़द्वेष्ये चरित्वा पूर्वमेव च ||
२१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
८८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखदुःखे महाप्राज्ञे त्वादृशी सोढुमर्हति ||
९२ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
१८
व्राह्मण उवाच
सुखदुःखे सदा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७९
भीष्म उवाच
सुखदुःखे समाधाय़ पुमानन्येन गच्छति |
२२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२४
श्रीभगवानु उवाच
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जय़ाजय़ौ |
३८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२७७
भीष्म उवाच
सुखदुःखे समे यस्य लाभालाभौ जय़ाजय़ौ |
३७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२२०
भीष्म उवाच
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्याय़ेणाधिगच्छति |
२८ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्याय़ेणोपसेवते |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२१२
भीष्म उवाच
सुखदुःखेति यामाहुरदुःखेत्यसुखेति च ||
११ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९
वैशम्पाय़न उवाच
सुखदुःखैरहं त्वं च प्रजाः सर्वाश्च सृञ्जय़ |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय
४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखप्रवुद्धा राजानमुपतस्थुर्युधिष्ठिरम् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
३२
सञ्जय़ उवाच
सुखप्रिय़े धर्महीने न पार्थो; ऽनुरुध्यते भारत तस्य विद्धि ||
११ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
२७
सञ्जय़ उवाच
सुखप्रिय़े सेवमानोऽतिवेलं; योगाभ्यासे यो न करोति कर्म |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१५२
भीष्म उवाच
सुखप्रिय़ैस्तान्सुमहाप्रतापा; न्यत्तोऽप्रमत्तश्च समर्थय़ेथाः |
३२ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२६
युधिष्ठिर उवाच
सुखप्रेप्सुर्विजिघांसुश्च दुःखं; य इन्द्रिय़ाणां प्रीतिवशानुगामी |
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१८३
भृगुरु उवाच
सुखप्रय़ोजना भरद्वाज उवाच ||
९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९५
भीष्म उवाच
सुखभागी च भवति न च दुर्गाण्यवाप्नुते ||
८५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१३३
महेश्वर उवाच
सुखभागी निराय़ासो निरुद्वेगः सदा नरः |
४२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखमन्ते हि दुःखानां दुःखमन्ते सुखस्य च |
२४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१०५
भीष्म उवाच
सुखमर्थाश्रय़ं येषामनुशोचामि तानहम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७२
भीष्म उवाच
सुखमसुखमनर्थमर्थलाभं; रतिमरतिं मरणं च जीवितं च |
३० क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
५
धृतराष्ट्र उवाच
सुखमस्म्युषितः पुत्र त्वय़ा सुपरिपालितः ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
७२
कच उवाच
सुखमस्म्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम ||
१४ ख
आदि पर्व
अध्याय
४३
सूत उवाच
सुखमस्म्युषितो भद्रे व्रूय़ास्त्वं भ्रातरं शुभे |
२९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्वुद्धिग्राह्यमतीन्द्रिय़म् |
२१ क
वन पर्व
अध्याय
२४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुखमापतितं सेवेद्दुःखमापतितं सहेत् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१५९
सञ्जय़ उवाच
सुखमाप्तवती वीरमर्जुनं प्रत्यपूजय़त् ||
३१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६३
भीष्म उवाच
सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्यगात् ||
१६ ख
स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय
२
वैशम्पाय़न उवाच
सुखमासादय़िष्यामस्त्वां दृष्ट्वा राजसत्तम ||
३४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५९
सञ्जय़ उवाच
सुखमाय़त्तमत्यर्थं यात्रा च मधुसूदन ||
१० ख
वन पर्व
अध्याय
१५९
वैशम्पाय़न उवाच
सुखमूषुर्गतोद्वेगाः पूजिताः सर्वराक्षसैः ||
३५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१७३
व्यास उवाच
सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुहागताः ||
४१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२९२
वसिष्ठ उवाच
सुखमेव च कर्तव्यं सकृत्कृत्वा सुखं मम |
३४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१८८
भीष्म उवाच
सुखमेष्यति तत्तस्य यदेवं संय़तात्मनः ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय
२४७
देवदूत उवाच
सुखव्याप्तमनस्कानां पतनं यच्च मुद्गल ||
२९ ख
आदि पर्व
अध्याय
६४
वैशम्पाय़न उवाच
सुखशीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः |
१३ क
आदि पर्व
अध्याय
२१८
वैशम्पाय़न उवाच
सुखशीतानिलगुणं प्रकृतिस्थार्कमण्डलम् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२२३
वासुदेव उवाच
सुखशीलः सुसम्भोगः सुभोज्यः स्वादरः शुचिः |
९ क