chevron_left  सुकुमारीarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसंनिभा ||
१२ ग
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
सुकुमारी कुमारी च सीता कावेरका तथा |
३० क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
सुकुमारी च ते भार्या भविष्यति न संशय़ः ||
२३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
सुकुमारी च देवर्षिं वानरप्रतिमाननम् |
३१ क
विराट पर्व
अध्याय ३
युधिष्ठिर उवाच
सुकुमारी च वाला च राजपुत्री यशस्विनी |
१४ क
सभा पर्व
अध्याय ६९
विदुर उवाच
सुकुमारी च वृद्धा च नित्यं चैव सुखोचिता ||
५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
सुकुमारी प्रदुद्राव परपत्यभिशङ्कय़ा ||
३८ ख
महाप्रस्थानिक पर्व
अध्याय ३
वैशम्पाय़न उवाच
सुकुमारी सुखार्हा च राजपुत्री पुरन्दर |
४ क
वन पर्व
अध्याय ६५
सुदेव उवाच
सुकुमारीं सुजाताङ्गीं रत्नगर्भगृहोचिताम् |
१५ क
द्रोण पर्व
अध्याय ९
वैशम्पाय़न उवाच
सुकुमारो युवा शूरो दर्शनीय़श्च पाण्डवः |
२५ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८८
वैशम्पाय़न उवाच
सुकुमारो युवा शूरो दर्शनीय़श्च पाण्डवः |
३८ क
वन पर्व
अध्याय १४४
वैशम्पाय़न उवाच
सुकुमारौ कथं पादौ मुखं च कमलप्रभम् |
११ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
सुकुमारौ च तौ विद्वान्कराभ्यां मुनिसत्तमः |
५२ क
वन पर्व
अध्याय १४१
भीम उवाच
सुकुमारौ तथा वीरौ माद्रीनन्दिकरावुभौ |
१७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११०
भीष्म उवाच
सुकुमार्यश्च नार्यस्तं रममाणाः सुवर्चसः |
११३ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३०
वासुदेव उवाच
सुकुमार्यां कुमार्यां ते तस्मादेष शपाम्यहम् ||
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
भीष्म उवाच
सुकृच्छ्रामापदं प्राप्तश्चान्नदः पुरुषस्तरेत् |
६२ क
उद्योग पर्व
अध्याय ८
युधिष्ठिर उवाच
सुकृतं ते कृतं राजन्प्रहृष्टेनान्तरात्मना |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ३१६
नारद उवाच
सुकृतं दुष्कृतं च त्वा यास्यन्तमनुय़ास्यति ||
३५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २
भीष्म उवाच
सुकृतं दुष्कृतं चापि कर्म धर्मभृतां वर ||
७३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २६९
भीष्म उवाच
सुकृतं दुष्कृतं चोभे नानुरुध्येत कर्मणि ||
१४ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १११
नारद उवाच
सुकृतं दुष्कृतं वा त्वं माहात्म्यात्क्षन्तुमर्हसि ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय १५६
वैशम्पाय़न उवाच
सुकृतं प्रतिकर्तुं च कच्चिद्धातुं च दुष्कृतम् |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
सुकृतक्षय़ाद्दुष्कृतं च तद्विद्धि मनुजाधिप ||
१८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५९
भीष्म उवाच
सुकृतस्य क्षय़ाच्चैव स्वर्लोकादेत्य मेदिनीम् |
१३५ क
शान्ति पर्व
अध्याय ८५
वृहस्पतिरु उवाच
सुकृतस्य हि सान्त्वस्य श्लक्ष्णस्य मधुरस्य च |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ४५
वैशम्पाय़न उवाच
सुकृतां सुप्रवेशां च निवेदय़त मे शनैः ||
४७ ख
वन पर्व
अध्याय १
युधिष्ठिर उवाच
सुकृतानेन मे तुष्टिः सत्कारश्च भविष्यति ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
सुकृतासुकृतं कर्म निषेव्य विविधैः क्रमैः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २७९
भीष्म उवाच
सुकृती विन्दति सुखं प्राप्य देहक्षय़ं नरः ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
सुकृते दुष्कृतं कर्म न यथार्थं प्रपद्यते ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६
भीष्म उवाच
सुकृते दुष्कृते वापि तादृशं लभते फलम् ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २५९
द्युमत्सेन उवाच
सुकृतेनैव राजानो भूय़िष्ठं शासते प्रजाः ||
२५ ख
सभा पर्व
अध्याय ८
नारद उवाच
सुकृतैः कर्मभिः पुण्यैः परिवर्हैर्विभूषिताः ||
३४ ख
वन पर्व
अध्याय २४७
देवदूत उवाच
सुकृतैस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ||
१२ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४२
सूत उवाच
सुकृतो यत्र ते यज्ञस्तत्र देवा हितास्तव |
१२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४०
भीष्म उवाच
सुकृशो वाय़ुभग्नाङ्गः शकुनिर्विकृतस्तथा ||
३४ ख
विराट पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
सुकृष्णवासा गिरिराजसारवा; न्स मत्स्यराजं समुपेत्य तस्थिवान् ||
२ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
सुकेतुं त्रिंशता वाणैः सर्वमर्मस्वताडय़त् ||
२६ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३८
सञ्जय़ उवाच
सुकेतुस्तु ततो राजन्गौतमं नवभिः शरैः |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ५४
वृहदश्व उवाच
सुकेशान्तानि चारूणि सुनासानि शुभानि च |
७ क
विराट पर्व
अध्याय ८
सुदेष्णो उवाच
सुकेशी सुस्तनी श्यामा पीनश्रोणिपय़ोधरा |
११ क
शान्ति पर्व
अध्याय २८५
पराशर उवाच
सुक्षेत्राच्च सुवीजाच्च पुण्यो भवति सम्भवः |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१९
नमुचिरु उवाच
सुखं च दुःखं च तथैव मध्यमं; निषेवते यः स धुरन्धरो नरः ||
१६ ख
वन पर्व
अध्याय २७९
अश्वपतिरु उवाच
सुखं च दुःखं च भवाभवात्मकं; यदा विजानाति सुताहमेव च |
१० क
उद्योग पर्व
अध्याय ३६
विदुर उवाच
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च; लाभालाभौ मरणं जीवितं च |
४५ क
शान्ति पर्व
अध्याय २६
वैशम्पाय़न उवाच
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च; लाभालाभौ मरणं जीवितं च |
३१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ५३
भीष्म उवाच
सुखं चैवास्मि वोढव्यो जनः सर्वश्च पश्यतु ||
३५ ख
आदि पर्व
अध्याय ६९
शकुन्तलो उवाच
सुखं जीवन्त्यदोषज्ञा मूर्खा दोषानुदर्शिनः |
१३ क
शान्ति पर्व
अध्याय २१७
वलिरु उवाच
सुखं जीवन्सहामात्यो भवितव्यं हि तत्तथा ||
३३ ख