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शान्ति पर्व
अध्याय २६६
भीष्म उवाच
सिध्यन्ति चास्य सङ्कल्पा विज्ञानं च प्रवर्तते ||
१६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २३२
व्यास उवाच
सिध्यन्ति चास्य सर्वार्था विज्ञानं च प्रवर्तते ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय ३७
वैशम्पाय़न उवाच
सिध्यन्त्यर्था महावाहो दैवं चात्र प्रदक्षिणम् ||
५ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६४
भीष्म उवाच
सिध्यन्त्यर्थाः सदा तस्य कार्याणि विविधानि च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २१८
मार्कण्डेय़ उवाच
सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ||
४७ ग
कर्ण पर्व
अध्याय २४
देवा ऊचुः
सिनीवालीमनुमतिं कुहूं राकां च सुव्रताम् |
७४ ख
वन पर्व
अध्याय १७९
वैशम्पाय़न उवाच
सिन्धवः शोभय़ां चक्रुः काननानि तपात्यये ||
६ ख
वन पर्व
अध्याय १८६
मार्कण्डेय़ उवाच
सिन्धुं चैव विपाशां च नदीं गोदावरीमपि |
९४ क
सभा पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सिन्धुकूलाश्रिता ये च ग्रामणेय़ा महावलाः ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
सिन्धुक्षिदूर्मिस्त्रिककुत्त्रिधामा त्रिवृदच्युतः ||
१० ख
शल्य पर्व
अध्याय ३९
जनमेजय़ उवाच
सिन्धुद्वीपः कथं चापि व्राह्मण्यं लव्धवांस्तदा ||
१ ख
शल्य पर्व
अध्याय ३८
वैशम्पाय़न उवाच
सिन्धुद्वीपश्च राजर्षिर्देवापिश्च महातपाः |
३२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ४
भीष्म उवाच
सिन्धुद्वीपाच्च राजर्षिर्वलाकाश्वो महावलः ||
४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८९
धृतराष्ट्र उवाच
सिन्धुराजं च सम्प्रेक्ष्य गाण्डीवस्येषुगोचरे ||
१७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ८७
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजं परित्यज्य सौभद्रः परवीरहा |
७१ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजं परित्रातुं स वो मध्ये कथं हतः ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६६
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजं परीप्सन्वै द्रोणानीकमुपाद्रवत् ||
१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजमभिप्रेक्ष्य हृष्टौ व्यनदतां मुहुः ||
३२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजमवेक्षन्तौ तत्पुत्रास्तव शुश्रुवुः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५८
धृतराष्ट्र उवाच
सिन्धुराजवधेनेमे घटोत्कचवधेन ते |
१८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजवलोद्धूतः सोऽभज्यत महानसिः ||
६७ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्तथातिष्ठच्छ्रीमान्मेरुरिवाचलः ||
१८ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ४२
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्य तत्कर्म प्रेक्ष्याश्रद्धेय़मुत्तमम् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ३३
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्य पार्श्वस्था अश्वत्थामपुरोगमाः |
१९ क
द्रोण पर्व
अध्याय १२१
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्य मूर्धानमुत्सङ्गे समपातय़त् ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्य यत्कृत्यं गतस्य यमसादनम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय ७६
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्य रक्षार्थं पराक्रान्तः सुतस्तव ||
३६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२७
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजस्य समरे नाभविष्यज्जनक्षय़ः ||
९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजानमाश्रित्य स वो मध्ये कथं हतः ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराजार्थसिद्ध्यर्थमग्रानीके व्यवस्थितौ ||
२० ख
द्रोण पर्व
अध्याय १२६
धृतराष्ट्र उवाच
सिन्धुराजे हते तात समरे सव्यसाचिना |
१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ४१
धृतराष्ट्र उवाच
सिन्धुराजेन येनैकः क्रुद्धान्पार्थानवारय़त् ||
१० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६२
भीष्म उवाच
सिन्धुराजो महाराज मतो मे द्विगुणो रथः |
३० क
भीष्म पर्व
अध्याय ८८
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराज्ञोऽर्धचन्द्रेण वाराहं स्वर्णभूषितम् |
३५ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४
सञ्जय़ उवाच
सिन्धुराष्ट्रमुखानीह दश राष्ट्राणि यस्य वै |
११ क
वन पर्व
अध्याय २१२
मार्कण्डेय़ उवाच
सिन्धुवर्जं पञ्च नद्यो देविकाथ सरस्वती |
२१ क
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सिन्धुवारानथोद्दामान्मन्मथस्येव तोमरान् |
५७ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
सिन्धुश्च देविका चैव पुष्करं तीर्थमेव च ||
१४ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २२
गान्धार्यु उवाच
सिन्धुसौवीरगान्धारकाम्वोजय़वनस्त्रिय़ः ||
११ ख
स्त्री पर्व
अध्याय २२
गान्धार्यु उवाच
सिन्धुसौवीरभर्तारं दर्पपूर्णं मनस्विनम् |
९ क
अनुशासन पर्व
अध्याय १५१
भीष्म उवाच
सिन्धूत्तमं तपोदानं जम्वूमार्गमथापि च ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय ८०
पुलस्त्य उवाच
सिन्धूत्तममिति ख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् |
९५ क
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
सिन्धोरिव महौघेन ह्रिय़माणान्यथा प्लवान् ||
८ ख
आदि पर्व
अध्याय ८९
वैशम्पाय़न उवाच
सिन्धोर्नदस्य महतो निकुञ्जे न्यवसत्तदा |
३५ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सिन्धोश्च प्रभवं गत्वा सिद्धगन्धर्वसेवितम् |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९०
भीष्म उवाच
सिराशतसमाकीर्णे नवद्वारे पुरेऽशुचौ ||
३३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २८६
पराशर उवाच
सिरास्नाय़्वस्थिसङ्घातं वीभत्सामेध्यसङ्कुलम् |
१४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ११६
भीष्म उवाच
सिलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह |
६९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सिषिचुर्भैरवान्नादान्विनदन्तो जिघांसवः ||
४७ ख