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स्त्री पर्व
अध्याय १७
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहेनेव द्विपः सङ्ख्ये भीमसेनेन पातितः ||
१४ ख
शल्य पर्व
अध्याय ६०
सञ्जय़ उवाच
सिंहेनेव महाराज मत्तं वनगजं वने ||
२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७२
सञ्जय़ उवाच
सिंहेनेव मृगं ग्रस्तं नरसिंहेन मारिष |
३२ क
द्रोण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
सिंहेनेव मृगान्वन्यांस्त्रासितान्दृढधन्वना ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १५०
सञ्जय़ उवाच
सिंहेनेवार्दितं वन्यं गजानामाकुलं कुलम् ||
८१ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३५
सञ्जय़ उवाच
सिंहेनेवार्दिता गावो विद्रविष्यन्ति सर्वतः ||
११ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १३१
सञ्जय़ उवाच
सिंहैरिव वभौ मत्तं गजानामाकुलं कुलम् ||
९६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ३७
विदुर उवाच
सिंहैर्विहीनं हि वनं विनश्ये; त्सिंहा विनश्येय़ुरृते वनेन ||
६० ख
उद्योग पर्व
अध्याय १२८
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहो मृगानिव क्रुद्धो गमय़ेद्यमसादनम् ||
२१ ख
वन पर्व
अध्याय १८
वासुदेव उवाच
सिंहोन्नतं चाप्यभिगर्जतोऽस्य; शुश्राव लोकोऽद्भुतरूपमग्र्यम् ||
६ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहोन्नतांसो गजखेलगामी; पद्माय़ताक्षोऽर्जुन एष वीरः ||
७ ख
विराट पर्व
अध्याय ७
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहोन्नतांसोऽय़मतीव रूपवा; न्प्रदृश्यते को नु नरर्षभो युवा ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय ६१
दमय़न्त्यु उवाच
सिंहोरस्क महावाहो निषधानां जनाधिप |
१२ क
आदि पर्व
अध्याय १०५
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहोरस्कं गजस्कन्धमृषभाक्षं मनस्विनम् |
६ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
वैशम्पाय़न उवाच
सिंहोरस्को महावाहुः सिंहवक्षा महावलः |
२२ क
शान्ति पर्व
अध्याय ११७
भीष्म उवाच
सिंहोऽतिवलसंय़ुक्तो भूय़ः शरभतां गतः |
४२ क
आदि पर्व
अध्याय २०२
नारद उवाच
सिंहौ भूत्वा पुनर्व्याघ्रौ पुनश्चान्तर्हितावुभौ |
२१ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति |
४ क
सभा पर्व
अध्याय ७१
विदुर उवाच
सिकता वपन्सव्यसाची राजानमनुगच्छति ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय १२१
लोमश उवाच
सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः |
८ क
द्रोण पर्व
अध्याय १६४
सञ्जय़ उवाच
सिकताः पृश्नय़ो गर्गा वालखिल्या मरीचिपाः |
८८ क
सभा पर्व
अध्याय ४९
दुर्योधन उवाच
सिक्तं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा |
१५ क
आदि पर्व
अध्याय २१३
वैशम्पाय़न उवाच
सिक्तसंमृष्टपन्थानं पुष्पप्रकरशोभितम् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय ७६
वृहदश्व उवाच
सिक्तसंमृष्टपुष्पाढ्या राजमार्गाः कृतास्तदा ||
६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय २५
सञ्जय़ उवाच
सिक्त्वा व्यत्रासय़न्नागस्ते पार्थमहरंस्ततः ||
४३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सिक्त्वाम्भसा समाश्वास्य तत्तदुक्त्वा हितं वचः ||
३४ ख
आदि पर्व
अध्याय ७९
यदुरु उवाच
सितश्मश्रुशिरा दीनो जरय़ा शिथिलीकृतः |
५ क
कर्ण पर्व
अध्याय २१
सञ्जय़ उवाच
सितहय़मुपय़ान्तमन्तिकं; हृतमनसो ददृशुस्तदारय़ः ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १८
वैशम्पाय़न उवाच
सिता वहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ||
३१ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६७
व्यास उवाच
सिता वहुविधैः पाशैर्ये न तुष्टाः स्वकैर्धनैः ||
१३ ख
वन पर्व
अध्याय ४३
वैशम्पाय़न उवाच
सिताभ्रकूटप्रतिमाः संहताश्च यथोपलाः ||
६ ख
सभा पर्व
अध्याय १०
नारद उवाच
सिताभ्रशिखराकारा प्लवमानेव दृश्यते ||
४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ३१
सञ्जय़ उवाच
सिताश्चाश्वाः समाय़ुक्तास्तव कर्ण महारथे |
४४ क
द्रोण पर्व
अध्याय १०७
सञ्जय़ उवाच
सितासिता महाराज यथा व्योम्नि वलाहकाः ||
२७ ख
वन पर्व
अध्याय १५५
वैशम्पाय़न उवाच
सितासिताभ्रप्रतिमा वालसूर्यसमप्रभाः |
८२ क
शल्य पर्व
अध्याय ५९
सञ्जय़ उवाच
सितासितौ यदुवरौ शुशुभातेऽधिकं ततः |
१० क
सभा पर्व
अध्याय ४३
दुर्योधन उवाच
सिद्धं च पाण्डवेय़ानां प्रतापेन महात्मनाम् ||
२४ ख
कर्ण पर्व
अध्याय २७
सञ्जय़ उवाच
सिद्धं सिंहं केसरिणं वृहन्तं; वालो मूढः क्षुद्रमृगस्तरस्वी |
३५ क
आदि पर्व
अध्याय ५९
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धः पूर्णश्च वर्ही च पूर्णाशश्च महाय़शाः |
४५ क
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
सिद्धक्षेत्रं तु तज्ज्ञेय़ं गङ्गातीरसमाश्रितम् ||
८३ ख
वन पर्व
अध्याय ८३
पुलस्त्य उवाच
सिद्धचारणगन्धर्वा मानुषाः पन्नगास्तथा |
२४ क
वन पर्व
अध्याय ८२
पुलस्त्य उवाच
सिद्धचारणगन्धर्वाः किंनराः समहोरगाः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय १२
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्कीर्णः सागरः परिमण्डलः ||
७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय १३
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्कीर्णो गौरप्राय़ो जनाधिप |
२३ क
आदि पर्व
अध्याय १११
वैशम्पाय़न उवाच
सिद्धचारणसङ्घानां वभूव प्रिय़दर्शनः ||
१ ख
कर्ण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घानां विस्मय़ः समपद्यत ||
२२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ६३
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घानां विस्मय़ः सुमहानभूत् |
३१ क
द्रोण पर्व
अध्याय ८२
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घानां विस्मय़ाद्भुतदर्शनम् ||
१३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७५
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घानां सैनिकानां च सर्वशः ||
३ ख
द्रोण पर्व
अध्याय ७३
सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घाश्च विदुर्द्रोणस्य कर्म तत् ||
४० ख