आदि पर्व
अध्याय
१६१
गन्धर्व उवाच
साधु मामसितापाङ्गे कामार्तं मत्तकाशिनि |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
५२
वैशम्पाय़न उवाच
साधु मे त्वं प्रसीदस्व दाशार्हकुलनन्दन ||
९ ख
आदि पर्व
अध्याय
१९३
दुर्योधन उवाच
साधु वा यदि वासाधु किं वा राधेय़ मन्यसे ||
१९ ख
वन पर्व
अध्याय
२३
वासुदेव उवाच
साधु सम्पश्य वार्ष्णेय़ शाल्वं सौभपतिं स्थितम् ||
२० ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
३८
कुन्त्यु उवाच
साधु सर्वमिदं तथ्यमेवमेव यथात्थ माम् ||
१९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
७८
वैशम्पाय़न उवाच
साधु साधु महावाहो वत्स चित्राङ्गदात्मज |
२५ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८१
वैशम्पाय़न उवाच
साधु साध्विति चाकाशे वभूव सुमहान्स्वनः ||
१५ ख
विराट पर्व
अध्याय
१५
वैशम्पाय़न उवाच
साधु साध्विति चाप्याहुः कीचकं च व्यगर्हय़न् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
३२०
भीष्म उवाच
साधु साध्विति तत्रासीन्नादः सर्वत्र भारत ||
१३ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति नादेन पृथिवीमनुनादय़न् ||
६४ ख
शल्य पर्व
अध्याय
४
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति राजानं क्षत्रिय़ाः सम्वभाषिरे ||
४६ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
५४
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति राजेन्द्र फल्गुनं प्रत्यपूजय़न् ||
५ ग
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
व्रह्मो उवाच
साधु साध्विति विश्वेशः स्मय़मानोऽभ्यभाषत ||
११२ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
११२
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति वेगेन सिंहनादमथानदन् ||
१६ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
७९
वैशम्पाय़न उवाच
साधु साध्विति शैनेय़ं हर्षय़न्तो युय़ुत्सवः ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
वैशम्पाय़न उवाच
साधु साध्विति संहृष्टाः पुष्यमाणैरिवाननैः |
२६ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१६
वैशम्पाय़न उवाच
साधु साध्विति सर्वः स जनः प्रतिगृहीतवान् ||
२४ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
४१
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरुः स्तुतिसंहिताः |
१०२ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९२
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति सैन्यानां प्रणादोऽभूद्विशां पते ||
४१ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
९१
सञ्जय़ उवाच
साधु साध्विति सैन्यानि पाण्डवेय़ान्यपूजय़न् ||
४४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
३४
पृथिव्यु उवाच
साधु साध्वित्यथेत्युक्त्वा मेदिनीं प्रत्यपूजय़त् ||
२८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६४
भीष्म उवाच
साधु हिंसय़ मां सत्य हतो यास्यामि सद्गतिम् ||
१३ ख
स्त्री पर्व
अध्याय
७
विदुर उवाच
साधुः परमदुःखानां दुःखभैषज्यमाचरेत् ||
१७ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१३
भीष्म उवाच
साधुकामश्चास्पृहय़न्नाय़ाति प्रत्ययं नृषु ||
११ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०४
राजन्य उवाच
साधुभिर्गर्हितं कर्म चण्डालस्य विधीय़ते |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय
३६
व्यास उवाच
साधुभ्यो वै दरिद्रेभ्यो दत्त्वा मुच्येत किल्विषात् ||
१० ख
भीष्म पर्व
अध्याय
३१
श्रीभगवानु उवाच
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ||
३० ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३६
भीष्म उवाच
साधुर्भवाञ्श्रुतार्थोऽस्मि प्रीय़ते न च विश्वसे |
१८३ क
शल्य पर्व
अध्याय
९
सञ्जय़ उवाच
साधुवादस्वनांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् ||
२० ख
आदि पर्व
अध्याय
१२७
वैशम्पाय़न उवाच
साधुवादानुसम्वद्धः सूर्यश्चास्तमुपागमत् ||
१८ ख
शल्य पर्व
अध्याय
१२
सञ्जय़ उवाच
साधुवादो महाञ्जज्ञे सिद्धाश्चासन्प्रहर्षिताः |
२ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
२८
श्रीभगवानु उवाच
साधुष्वपि च पापेषु समवुद्धिर्विशिष्यते ||
९ ख
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
११
धृतराष्ट्र उवाच
साधुसङ्ग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात्तथा ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
५१
सञ्जय़ उवाच
साधूनसूय़तां ये च ये चापि परिवादिनाम् |
२६ क
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९३
पुत्र उवाच
साधूनां काङ्क्षितं ह्येतत्पितुर्वृद्धस्य पोषणम् ||
३१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०७
भीष्म उवाच
साधूनां च यथा वृत्तमेतदाचारलक्षणम् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
९६
भीष्म उवाच
साधूनां तु मिथोभेदात्साधुश्चेद्व्यसनी भवेत् |
१२ क
वन पर्व
अध्याय
४३
वैशम्पाय़न उवाच
साधूनां धर्मशीलानां मुनीनां पुण्यकर्मणाम् |
२२ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४५
भीष्म उवाच
साधूनां पुनराचारो गरीय़ो धर्मलक्षणम् ||
६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
११६
भीष्म उवाच
साधूनां संमतो नित्यं भवेन्मांसस्य वर्जनात् ||
१३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
५८
भीष्म उवाच
साधूनामपरित्यागः कुलीनानां च धारणम् |
७ क
शान्ति पर्व
अध्याय
६६
भीष्म उवाच
साधूनामर्चनीय़ानां प्रजासु विदितात्मनाम् |
१८ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१३३
भीष्म उवाच
साधूनामाचरन्क्षेमं दस्यून्पापान्निवर्तय़न् ||
२४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१२५
भीष्म उवाच
साधून्गृहस्थान्दृष्ट्वा च तथासाधून्वनेचरान् |
३२ क
वन पर्व
अध्याय
२७५
व्रह्मो उवाच
साधो सद्वृत्तमार्गस्थे शृणु चेदं वचो मम ||
२९ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
९४
भीष्म उवाच
साधोर्यः प्रतिगृह्णीय़ात्तथैवासाधुतो द्विजः |
२ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२५९
सत्यवानु उवाच
साधोश्चापि ह्यसाधुभ्यो जाय़तेऽशोभना प्रजा ||
११ ख
वन पर्व
अध्याय
१६४
इन्द्र उवाच
साध्यं पैतामहं चैव गन्धर्वोरगरक्षसाम् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
३४
युधिष्ठिर उवाच
साध्यरुद्रमरुत्कल्पैर्वस्वग्न्यादित्यविक्रमैः ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान्सविता मृडः |
१३७ क