वन पर्व
अध्याय
२७७
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वात्मना च मद्भक्त्या तुष्टास्मि तव पार्थिव ||
१२ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२७
सिद्ध उवाच
सर्वात्मना जाह्नवीं ये प्रपन्ना; स्ते व्रह्मणः सदनं सम्प्रय़ाताः ||
९२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२८४
पराशर उवाच
सर्वात्मना तु कुर्वीत गृहस्थः कर्मनिश्चय़म् |
३८ क
उद्योग पर्व
अध्याय
२३
युधिष्ठिर उवाच
सर्वात्मना परिजेतुं वय़ं चे; न्न शक्नुमो धृतराष्ट्रस्य पुत्रम् ||
२७ ख
भीष्म पर्व
अध्याय
६३
भीष्म उवाच
सर्वात्मना महात्मानं केशवं जगदीश्वरम् |
२१ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१६
वासुदेव उवाच
सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वगः सर्ववेदिता ||
३० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१७
उपमन्युरु उवाच
सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः ||
३० ख
कर्ण पर्व
अध्याय
२४
दुर्योधन उवाच
सर्वात्मानं महात्मानं येनाप्तं सर्वमात्मना ||
३८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२४२
व्यास उवाच
सर्वात्मानं महात्मानं विधूममिव पावकम् |
७ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४६
सञ्जय़ उवाच
सर्वानद्य रणे दृप्तान्प्रतिय़ोत्स्यामि पार्थिव ||
३७ ख
विराट पर्व
अध्याय
४८
अर्जुन उवाच
सर्वानन्याननादृत्य दृष्ट्वा तमतिमानिनम् |
९ क
भीष्म पर्व
अध्याय
९५
सञ्जय़ उवाच
सर्वानन्यान्हनिष्यामि सम्प्राप्तान्वाणगोचरान् ||
१३ ख
विराट पर्व
अध्याय
१०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानपृच्छच्च समीपचारिणः; कुतोऽय़माय़ाति न मे पुरा श्रुतः |
४ क
भीष्म पर्व
अध्याय
४२
सञ्जय़ उवाच
सर्वानभ्यभवच्छव्दान्भीमसेनस्य निस्वनः ||
१० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
१०८
भीष्म उवाच
सर्वानर्थः कुले यत्र जाय़ते पापपूरुषः |
९ क
आदि पर्व
अध्याय
९२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम् |
२७ क
द्रोण पर्व
अध्याय
१६१
सञ्जय़ उवाच
सर्वानविध्यन्निशितैर्दशभिर्दशभिः शरैः ||
१४ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४५
सञ्जय़ उवाच
सर्वानसम्भ्रमाद्राजन्प्रत्यविध्यत्त्रिभिस्त्रिभिः |
१८ ख
वन पर्व
अध्याय
४९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान्ससौवलान् |
१६ क
सभा पर्व
अध्याय
६९
युधिष्ठिर उवाच
सर्वानामन्त्र्य गच्छामि द्रष्टास्मि पुनरेत्य वः ||
३ ख
वन पर्व
अध्याय
१५७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानार्छन्महावाहुर्वलवान्सत्यविक्रमः ||
४८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१६९
भीष्म उवाच
सर्वानावारय़िष्यामि यावद्द्रक्ष्यामि भारत ||
१५ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१४९
गृध्र उवाच
सर्वानाविशते मृत्युरेवम्भूतमिदं जगत् ||
४१ ख
विराट पर्व
अध्याय
४३
कर्ण उवाच
सर्वानाय़ुष्मतो भीतान्सन्त्रस्तानिव लक्षय़े |
१ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
४८
भीष्म उवाच
सर्वानुपाय़ानपि सम्प्रधार्य; समुद्धरेत्स्वस्य कुलस्य तन्तुम् |
६ क
वन पर्व
अध्याय
२६१
मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वानुरक्तप्रकृतिं सर्वविद्याविशारदम् |
११ क
कर्ण पर्व
अध्याय
५४
भीम उवाच
सर्वानेकस्तानहं पातय़िष्ये; ते वा सर्वे भीमसेनं तुदन्तु ||
१९ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१६४
सञ्जय़ उवाच
सर्वानेकैकशो द्रोणः कपोताभानजीघनत् ||
१४२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय
१२६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानेताननादृत्य दुर्मतिर्निरपत्रपः |
२६ क
शान्ति पर्व
अध्याय
२८८
हंस उवाच
सर्वानेताननुचरन्वत्सवच्चतुरः स्तनान् |
३० क
द्रोण पर्व
अध्याय
१७०
सञ्जय़ उवाच
सर्वानेतान्हनिष्यामि यदि योत्स्यन्ति मां रणे |
७ क
आदि पर्व
अध्याय
१४०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानेव गमिष्यामि गृहीत्वा वो विहाय़सा ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३५
भीष्म उवाच
सर्वानेव तु तांस्तत्र ते विदुर्ग्रथिता इति ||
१४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१९२
भीष्म उवाच
सर्वानेव तु राजर्षिः सम्पूज्याभिप्रणम्य च |
३५ क
भीष्म पर्व
अध्याय
७४
सञ्जय़ उवाच
सर्वानेव महेष्वासान्भ्राजमानाञ्श्रिय़ा वृतान् ||
१५ ख
द्रोण पर्व
अध्याय
१४८
घटोत्कच उवाच
सर्वानेव वधिष्यामि राक्षसं धर्ममास्थितः ||
५९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
८७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानेव समानीतांस्तानपश्यन्त ते नृपाः ||
६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२१६
भीष्म उवाच
सर्वानेवासुराञ्जित्वा वलिं पप्रच्छ वासवः ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
२६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वानेवैष पर्याय़ो मर्त्यान्स्पृशति दुस्तरः |
१४ क
आदि पर्व
अध्याय
५१
सदस्या ऊचुः
सर्वान्कामांस्त्वत्त एषोऽर्हतेऽद्य; यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ||
२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१६८
व्राह्मण उवाच
सर्वान्कामाञ्जुगुप्सेत सङ्गान्कुर्वीत पृष्ठतः |
३९ ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय
९
इन्द्र उवाच
सर्वान्कामाननुजातोऽसि विप्र; यस्त्वं देवानां मन्त्रय़से पुरोधाः |
५ क
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
सर्वान्कामानुपाश्नानो ये दिव्या ये च मानुषाः ||
५८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१२०
भीष्म उवाच
सर्वान्कामान्कामय़ानो हि धीरः; सत्त्वेनाल्पेनाप्लुते हीनदेहः |
४१ क
शान्ति पर्व
अध्याय
१७१
भीष्म उवाच
सर्वान्कामान्परित्यज्य प्राप्य व्रह्म महत्सुखम् ||
५३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय
१३९
श्वपच उवाच
सर्वान्कामान्प्राप्नुवन्तीह विद्व; न्प्रिय़स्व कामं सहितः क्षुधा वै ||
७४ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
६४
भीष्म उवाच
सर्वान्कामान्प्रय़च्छन्ति ये प्रय़च्छन्ति काञ्चनम् |
१ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय
१
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वान्कामान्महातेजाः प्रददावम्विकासुते ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय
२०
अष्टावक्र उवाच
सर्वान्कामान्विधास्यामि रमस्व सहितो मय़ा |
५७ क
वन पर्व
अध्याय
२९१
सूर्य उवाच
सर्वान्कामय़ते यस्मात्कनेर्धातोश्च भामिनि |
१३ क