chevron_left  सर्वस्मिन्दस्युसाद्भूतेarrow_drop_down
शान्ति पर्व
अध्याय १३०
युधिष्ठिर उवाच
सर्वस्मिन्दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने ||
१ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३९
युधिष्ठिर उवाच
सर्वस्मिन्दस्युसाद्भूते पृथिव्यामुपजीवने |
६ क
भीष्म पर्व
अध्याय ११६
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्मिन्मानुषे लोके वेत्त्येको हि धनञ्जय़ः |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते ||
२ ख
उद्योग पर्व
अध्याय ६८
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्य च सदा ज्ञानात्सर्वमेनं प्रचक्षते ||
११ ख
भीष्म पर्व
अध्याय ३७
श्रीभगवानु उवाच
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो; मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |
१५ क
वन पर्व
अध्याय २७
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वस्य जगतः श्रेष्ठा व्राह्मणाः सङ्गतास्त्वय़ा ||
८ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६५
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्य जगतश्चैव गाङ्गेय़ न मृषा वदे |
१२ क
उद्योग पर्व
अध्याय १४९
युधिष्ठिर उवाच
सर्वस्य जगतस्तात सारासारं वलावलम् |
३३ क
भीष्म पर्व
अध्याय ५२
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्य जगतो गोप्ता गोप्ता यस्य जनार्दनः ||
१७ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय १
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत ||
२४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वस्य जीवलोकस्य राजधर्माः पराय़णम् ||
३ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
भीष्म उवाच
सर्वस्य दय़िताः प्राणाः सर्वः स्नेहं च विन्दति |
२५ क
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
सर्वस्य दय़िताः प्राणाः सर्वस्य दय़िताः सुताः |
५८ क
भीष्म पर्व
अध्याय ३०
श्रीभगवानु उवाच
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप; मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ||
९ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९५
वसिष्ठ उवाच
सर्वस्य सर्वमित्युक्तं ज्ञेय़ं ज्ञानस्य पार्थिव ||
८ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १४९
गृध्र उवाच
सर्वस्य हि प्रभुः कालो धर्मतः समदर्शनः ||
४० ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ६७
व्राह्मण उवाच
सर्वस्य हि प्रमाणं त्वं त्रैलोक्यस्यापि सत्तम ||
१४ ख
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्य हि स्वका प्रज्ञा साधुवादे प्रतिष्ठिता |
५ क
सौप्तिक पर्व
अध्याय ३
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्यात्मा वहुमतः सर्वात्मानं प्रशंसति ||
४ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १२५
युधिष्ठिर उवाच
सर्वस्याशा सुमहती पुरुषस्योपजाय़ते |
४ क
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
सर्वस्याश्रय़भूताश्च ते नराः स्वर्गगामिनः ||
९० ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वस्यासीत्पितृसमो रामो राज्यं यदान्वशात् ||
४७ ख
उद्योग पर्व
अध्याय १६
वृहस्पतिरु उवाच
सर्वस्यास्य भुवनस्य प्रसूति; स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ||
५ ख
आदि पर्व
अध्याय २२३
स्तम्वमित्र उवाच
सर्वस्यास्य भुवनस्य प्रसूति; स्त्वमेवाग्ने भवसि पुनः प्रतिष्ठा ||
१४ ख
वन पर्व
अध्याय २९
प्रह्लाद उवाच
सर्वस्यैकोऽपराधस्ते क्षन्तव्यः प्राणिनो भवेत् |
२८ क
अनुशासन पर्व
अध्याय ६८
भीष्म उवाच
सर्वस्यैवांशभाग्दाता तन्निमित्तं प्रवृत्तय़ः ||
१६ ख
द्रोण पर्व
अध्याय १६९
सञ्जय़ उवाच
सर्वस्वमपकृष्टं च तथाधर्मेण वालिश ||
३६ ख
शान्ति पर्व
अध्याय १३७
पूजन्यु उवाच
सर्वस्वमपि सन्त्यज्य कार्यमात्महितं नरैः ||
८० ख
आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९३
श्वशुर उवाच
सर्वस्वमेतद्यस्मात्ते त्यक्तं शुद्धेन चेतसा |
६४ क
कर्ण पर्व
अध्याय ४९
कृष्ण उवाच
सर्वस्वस्यापहारे तु वक्तव्यमनृतं भवेत् ||
२८ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय २४
भीष्म उवाच
सर्वहिंसानिवृत्ताश्च नराः सर्वसहाश्च ये |
९० क
अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
भीष्म उवाच
सर्वा एवाभ्यवर्तन्त या दिव्या याश्च मानुषाः ||
२ ख
वन पर्व
अध्याय २५
अर्जुन उवाच
सर्वा गतीर्विजानासि व्राह्मणानां न संशय़ः |
८ क
शान्ति पर्व
अध्याय १५४
भीष्म उवाच
सर्वा ग्राम्यास्तथारण्या याश्च लोके प्रवृत्तय़ः |
२१ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५६
दुर्योधन उवाच
सर्वा च पृथिवी सृष्टा मदर्थे तात पाण्डवान् |
३९ क
द्रोण पर्व
अध्याय २०
सञ्जय़ उवाच
सर्वा दिशः समचरत्सैन्यं विक्षोभय़न्निव |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ४७
सञ्जय़ उवाच
सर्वा दिशः सम्पतता रथेन; रजोध्वस्तं गाण्डिवेनापकृत्तम् |
५५ क
विराट पर्व
अध्याय ५६
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा दिशश्चाभ्यपतद्वीभत्सुरपराजितः |
२८ क
उद्योग पर्व
अध्याय ५५
सञ्जय़ उवाच
सर्वा दिशो योजनमात्रमन्तरं; स तिर्यगूर्ध्वं च रुरोध वै ध्वजः |
९ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ||
५२ ख
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा द्रोणदुघा गावो वैन्यस्यासन्प्रशासतः ||
१३२ ख
आदि पर्व
अध्याय ६०
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा नक्षत्रय़ोगिन्यो लोकय़ात्राविधौ स्थिताः ||
१५ ग
शान्ति पर्व
अध्याय २५५
तुलाधार उवाच
सर्वा नद्यः सरस्वत्यः सर्वे पुण्याः शिलोच्चय़ाः |
३९ क
आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा भवद्भिः परिपृच्छ्यमाना; नरेन्द्रपत्न्यः सुविशुद्धसत्त्वाः ||
१६ ख
अनुशासन पर्व
अध्याय ८०
व्यास उवाच
सर्वा मणिमय़ी भूमिः सूक्ष्मकाञ्चनवालुका |
१९ क
भीष्म पर्व
अध्याय ८
सञ्जय़ उवाच
सर्वा मणिमय़ी भूमिः सूक्ष्मकाञ्चनवालुका |
६ क
आदि पर्व
अध्याय १३३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा मातृस्तथापृष्ट्वा कृत्वा चैव प्रदक्षिणम् |
४ क
शान्ति पर्व
अध्याय २९
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः |
५९ क
विराट पर्व
अध्याय ६३
वैशम्पाय़न उवाच
सर्वा विनिर्जिता गावः कुरवश्च पराजिताः |
१९ क